नई दिल्ली। पश्चिमी राजस्थान की जोजारी, लूनी और बांडी नदियों में अवैध खनन तथा बढ़ते औद्योगिक प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के प्रति कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मामले पर सुनवाई करते हुए राज्य प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए और स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए, तो पूरे मामले की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने का आदेश दिया जाएगा। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि राज्य के अधिकारियों ने अवैध खनन को बढ़ावा दिया और नियमों के उल्लंघन की जानकारी होने के बावजूद खनन पट्टों को नियमित कर दिया, जो अधिकारियों के रवैये पर सवाल खड़े करता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने ‘हाई-लेवल इकोसिस्टम ओवरसाइट कमेटी’ की उन सिफारिशों को स्वीकार कर लिया, जिनमें पूरे दर्ज ‘रिवर कॉरिडोर’ की सुरक्षा करने और वैज्ञानिक आधार पर ‘हाई फ्लड लाइन’ तय करने का सुझाव दिया गया था। पीठ ने स्पष्ट किया कि बाढ़ क्षेत्र का निर्धारण केवल सूखे मौसम के बहाव के आधार पर नहीं, बल्कि हर दो-तीन साल में आने वाली मानसूनी बाढ़ के आंकड़ों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने बालोतरा में लूनी नदी पर बने पुल की चौड़ाई और रिकॉर्ड में दर्ज नदी के बहाव की चौड़ाई के बीच के भारी अंतर को ‘बेतुकेपन की पराकाष्ठा’ करार दिया तथा अदालत को गुमराह करने वाले अधिकारियों पर नाराजगी जताई।
अदालत ने राज्य सरकार को आगामी 27 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में ‘जीरो-लिक्विड-डिस्चार्ज’ तकनीक पर आधारित ‘कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट’ की स्थापना के लिए एक ठोस वित्तीय प्रस्ताव प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इसमें लागत का खर्च राज्य सरकार और उद्योगों द्वारा वहन किया जाएगा। पीठ ने आर्थिक तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि कुछ उद्योगों के वित्तीय लाभ के लिए 20 लाख लोगों की जिंदगी और स्वास्थ्य को खतरे में नहीं डाला जा सकता। उल्लेखनीय है कि जोजारी नदी में बोरनाडा के कपड़ा और रासायनिक उद्योगों से निकलने वाले सल्फर, सीसा और कैडमियम जैसे जहरीले रसायनों के कारण 100 से 150 किलोमीटर तक की कृषि भूमि बंजर हो चुकी है और भूजल दूषित होने से बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य संकट खड़ा हो गया है।








