नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की उस याचिका पर निर्देश देने से इनकार कर दिया, जिसमें वैकल्पिक निवेश कोष (AIF), विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) और भारत में उनके मध्यस्थों के अंतिम वास्तविक लाभार्थियों तथा निवेश पोर्टफोलियो का सार्वजनिक खुलासा अनिवार्य करने की मांग की गई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि फिलहाल ऐसा कोई कानूनी प्रावधान या नियामकीय ढांचा मौजूद नहीं है, जिसके आधार पर इस तरह के पूर्ण सार्वजनिक खुलासे का निर्देश दिया जा सके।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति डी.के. उपाध्याय की पीठ ने महुआ मोइत्रा की याचिका पर सुनवाई की। पीठ ने शुरुआत में याचिका दायर करने पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस मुद्दे को संसद में उठाया जा सकता था और इस पर चर्चा की मांग की जा सकती थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी विषय पर कानूनी व्यवस्था या नियामकीय ढांचा ही मौजूद नहीं है, तो वह भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) को पूर्ण सार्वजनिक खुलासे का आदेश नहीं दे सकती। पीठ ने कहा कि यदि कोई कानूनी व्यवस्था मौजूद होती और सेबी उसका पालन नहीं कर रहा होता, तो अदालत अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दे सकती थी। लेकिन मौजूदा स्थिति में ऐसा आदेश जारी नहीं किया जा सकता। इसके बाद अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से क्या दलील दी गई?
महुआ मोइत्रा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि भले ही इस संबंध में कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा मौजूद न हो, फिर भी अदालत सेबी को निवेश कोषों के वास्तविक लाभार्थियों का पूरा विवरण सार्वजनिक करने का निर्देश दे सकती है।
उन्होंने तर्क दिया कि कुछ निवेशक कंपनियों के शेयरों की कीमतों को बढ़ाकर बाजार को प्रभावित कर सकते हैं और इससे आम निवेशकों के हितों को नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए अधिक पारदर्शिता की आवश्यकता पर जोर दिया।
याचिका में क्या मांग की गई थी?
महुआ मोइत्रा ने अपनी जनहित याचिका में भारतीय वित्तीय बाजारों में पारदर्शिता बढ़ाने और निवेशकों को अधिक जानकारी उपलब्ध कराने की मांग की थी। इसके तहत वैकल्पिक निवेश कोषों (AIF) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के अंतिम वास्तविक लाभार्थियों की पहचान तथा उनके निवेश पोर्टफोलियो का सार्वजनिक खुलासा अनिवार्य करने की मांग शामिल थी।
याचिका में कहा गया था कि सेबी भारत के प्रतिभूति बाजार का नियमन करता है और उसके दायित्वों में AIF तथा FPI के कामकाज की निगरानी करना भी शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इस मामले में सार्वजनिक खुलासे को अनिवार्य बनाने की मांग पर तत्काल न्यायिक निर्देश नहीं मिल सका। अदालत ने अपने फैसले में मौजूदा कानूनी व्यवस्था की अनुपस्थिति को इसका प्रमुख आधार बताया।








