अभिनेता राम कपूर ने हाल ही में एक रियलिटी शो के दौरान अपने बचपन से जुड़ा एक बेहद दर्दनाक अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि जब वह बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते थे, तब उनके साथ कथित तौर पर यौन शोषण की घटना हुई थी। इस घटना को याद करते हुए राम कपूर भावुक हो गए। शो में मौजूद अभिनेत्री जेनेलिया डिसूजा भी उनकी आपबीती सुनकर अपनी भावनाएं नहीं रोक सकीं और उनकी आंखें नम हो गईं।
राम कपूर ने बताया कि यह घटना तब की है जब वह महज 13 साल के थे और बोर्डिंग स्कूल में रहकर पढ़ाई कर रहे थे। उन्होंने कहा कि एक रात उनके साथ ऐसा अनुभव हुआ जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। अभिनेता ने कहा कि उस समय वह काफी छोटे थे और समझ नहीं पा रहे थे कि उनके साथ क्या हो रहा है। डर और सदमे की वजह से उन्होंने लंबे समय तक इस घटना के बारे में किसी से बात भी नहीं की।
अभिनेता ने कहा कि बचपन में इस तरह की घटनाएं किसी भी बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर छोड़ सकती हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि उस दर्द और ट्रॉमा से बाहर आने में उन्हें काफी समय लगा। उन्होंने यह भी कहा कि कई पीड़ित शर्म, डर या समाज के दबाव की वजह से वर्षों तक चुप रहते हैं, जबकि ऐसी घटनाओं पर खुलकर बात करना और मदद लेना बेहद जरूरी है।
राम कपूर की आपबीती सुनकर शो का माहौल भावुक हो गया। जेनेलिया डिसूजा सहित वहां मौजूद अन्य लोग भी उनकी कहानी सुनकर भावुक नजर आए। जेनेलिया ने कहा कि बच्चों के साथ होने वाली ऐसी घटनाएं बेहद दर्दनाक होती हैं और समाज को इस विषय पर अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है।
राम कपूर ने अपने अनुभव को साझा करते हुए यह संदेश भी दिया कि यदि किसी बच्चे या व्यक्ति के साथ इस तरह की घटना होती है, तो उसे चुप नहीं रहना चाहिए। परिवार, शिक्षकों और भरोसेमंद लोगों से बात करना तथा समय पर मदद लेना बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि पीड़ितों को दोषी महसूस करने की जरूरत नहीं है और उन्हें हर संभव समर्थन मिलना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की सुरक्षा केवल परिवार ही नहीं, बल्कि स्कूलों और समाज की भी जिम्मेदारी है। बच्चों को ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ के बारे में जागरूक करना, उनकी बात ध्यान से सुनना और किसी भी शिकायत को गंभीरता से लेना ऐसे मामलों की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
राम कपूर के इस खुलासे के बाद सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है। कई लोगों ने उनके साहस की सराहना की और कहा कि ऐसे अनुभव साझा करने से अन्य पीड़ितों को भी अपनी बात कहने का हौसला मिल सकता है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि इस तरह की संवेदनशील चर्चाएं समाज में जागरूकता बढ़ाने और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीरता लाने में मददगार साबित हो सकती हैं।








