यरूशलम। इज़राइल में हुए आम चुनावों के अंतिम नतीजों के इंतजार के बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गुट और उन्हें सत्ता से बाहर करने का प्रयास कर रहे विपक्षी दलों, दोनों के ही बहुमत के आंकड़े से पीछे रहने के आसार नजर आ रहे हैं। इस स्थिति ने देश में अगली सरकार के गठन को लेकर भारी अनिश्चितता पैदा कर दी है। आने वाले हफ्तों में इज़राइल को कठिन गठबंधन वार्ताओं का सामना करना पड़ेगा, जिसमें मुख्य सवाल यह है कि क्या कुछ यहूदी और अरब दल एक ऐतिहासिक गठबंधन बना सकते हैं या फिर नए सिरे से चुनाव कराने की नौबत आएगी। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया के दौरान नेतन्याहू प्रधानमंत्री पद पर बने रहेंगे।
सैन्य कर्मियों, कूटनीतिज्ञों, जेलों और अस्पतालों से आए लगभग पांच लाख अनुपस्थित (एब्सेंटी) मतों की गिनती पूरी होने के बाद अंतिम नतीजे जल्द ही घोषित किए जाने की उम्मीद है। हालांकि इनसे कुल स्थिति में किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं है। नेतन्याहू के मुख्य प्रतिद्वंद्वी और पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट ने एक बयान में कहा कि वह ऐसी सरकार का समर्थन करते हैं जो सभी नागरिकों की सेवा करे और जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करे।
इस चुनाव में अरब नागरिकों के भारी मतदान के बाद अरब-नेतृत्व वाले दलों, विशेषकर ‘जॉइंट लिस्ट’ ने मजबूत प्रदर्शन किया है और राजनीतिक सहयोग के रास्ते खुले रखने के संकेत दिए हैं। दूसरी ओर, सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने वाली नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने बिना कोई ठोस सबूत दिए अरब दलों पर चुनाव में गड़बड़ी का आरोप लगाया है, जिसे चुनाव समिति ने खारिज कर दिया है।
इज़राइल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग अगले हफ्ते किसी नेता को सरकार बनाने का न्यौता देंगे। यदि कोई भी दल या गठबंधन सरकार बनाने में विफल रहता है, तो देश को अगले साल की शुरुआत में एक और चुनाव का सामना करना पड़ सकता है। राष्ट्रपति हर्ज़ोग और आइजनकोट दोनों ने ही दोबारा चुनाव कराने से बचने की बात कही है। यह चुनाव ऐसे समय में हुआ है जब देश अनिवार्य सैन्य सेवा में अति-रूढ़िवादी यहूदियों (अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स) की छूट, गाज़ा युद्ध और बंधकों की रिहाई में देरी जैसे मुद्दों पर गहरा बंटा हुआ है। इसके अलावा, ईरान के साथ बढ़ते तनाव और अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनावों के बाद संभावित संघर्ष की स्थिति भी इज़राइल के राजनीतिक भविष्य को प्रभावित कर सकती है।








