कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला अहोई अष्टमी का व्रत संतान की लंबी आयु और सलामती के लिए रखा जाता है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को अहोई माता की पूजा व तारों या चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण करती हैं।
अहोई अष्टमी का व्रत चंद्रोदय व्यापिनी अष्टमी के अनुसार 1 नवंबर को रखा जाएगा। इस बार अष्टमी तिथि का आरंभ 1 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट पर हो रहा है। इसलिए व्रत कथा का पाठ दोपहर 2:51 बजे के बाद ही करना शुभ रहेगा।
अहोई अष्टमी की संपूर्ण पूजा विधि
प्रातः काल की तैयारी: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के मंदिर में पूजा करके पूरे दिन निर्जला व्रत रखने का संकल्प लें।
कथा का पाठ: अष्टमी तिथि दोपहर 2 बजकर 51 मिनट पर शुरू हो रही है, इसलिए इसके बाद ही अहोई अष्टमी की व्रत कथा का पाठ करें।
शाम की पूजा और चित्र स्थापना: शाम को पूजा के शुभ मुहूर्त में पूजा स्थल की दीवार पर अष्ट कोष्ठक की अहोई माता की प्रतिमा बनाएं। प्रतिमा के समीप सेई (स्याऊ) और उसके बच्चों का चित्र भी बनाएं। यदि चित्र बनाना संभव न हो, तो बाजार से छपा हुआ अहोई अष्टमी का चित्र लाकर दीवार पर लगा सकते हैं।
पूजा स्थल की तैयारी और कलश स्थापना: सूर्यास्त के बाद यानी तारे निकलने से पहले पूजा स्थान को अच्छी तरह साफ कर लें। वहां चौक पूरकर एक लोटे में जल भरें और उसे पटे पर कलश की भांति स्थापित करें।
अहोई स्याऊ की पूजा: चांदी की अहोई (स्याऊ) बनवाएं और उसमें चांदी के दो दाने डलवाकर डोरे में पिरो लें। अहोई माता की रोली, चावल, दूध और भात से श्रद्धापूर्वक पूजा करें। जल से भरे लोटे पर स्वस्तिक (सतिया) बनाएं।
बायना और कथा: एक कटोरी में हलवा और कुछ रुपये रखकर बायना निकालें। हाथ में गेहूं के सात दाने लेकर परिवार की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनें।
आशीर्वाद और माला धारण: कथा पूरी होने के बाद चांदी की अहोई (स्याऊ) की माला को अपने गले में धारण करें। निकाला हुआ बायना अपनी सासू जी के चरण स्पर्श करके उन्हें सौंप दें और उनका आशीर्वाद लें।
तारों को अर्घ्य व पारण: पूजा संपन्न होने के बाद आकाश में तारे निकलने पर जल से भरे लोटे से तारों को अर्घ्य दें। कई स्थानों पर चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा होती है, ऐसे में चंद्र दर्शन के बाद अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें। इस दिन दान-पुण्य करने का भी विशेष महत्व होता है।
अहोई माता का उजमन
यदि किसी महिला की पहली संतान हुई हो या संतान का विवाह हुआ हो, तो उन्हें अहोई माता का उजमन करना चाहिए:
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एक थाली में सात स्थानों पर चार-चार पूड़ियां रखें और उनके ऊपर हलवा रखें।
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थाली में एक साड़ी और कुछ रुपये भी रखें।
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सामग्री के चारों तरफ हाथ फेरकर (मनसा कर) सासू जी को प्रणाम करते हुए भेंट कर दें।
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सासू जी साड़ी और रुपये अपने पास रखकर हलवा-पूरी का बायना बांट दें। बहन-बेटी के घर भी यह बायना भिजवाना चाहिए।








