नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ के चर्चित और बहुचर्चित महादेव ऑनलाइन बेटिंग नेटवर्क मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को एक बहुत बड़ी सफलता हासिल हुई है। इस सट्टेबाजी नेटवर्क के कथित मास्टरमाइंड और मुख्य आरोपी सौरभ चंद्राकर को ओमान से सफलता पूर्वक भारत प्रत्यर्पित (Extradite) कर लिया गया है। अन्य केंद्रीय जांच एजेंसियों के साथ चलाए गए एक साझा अभियान के तहत सीबीआई की विशेष टीम आरोपी को भारत लेकर पहुंची है। भारत लाते ही सबसे पहले सौरभ चंद्राकर का अनिवार्य मेडिकल टेस्ट कराया जाएगा, जिसके बाद सीबीआई की टीम अदालत से उसकी ट्रांजिट रिमांड हासिल करेगी। इसके पश्चात उसे सोमवार को रायपुर स्थित सीबीआई की विशेष अदालत में पेश किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि सौरभ चंद्राकर सीबीआई के दो प्रमुख मामलों में लंबे समय से वांछित चल रहा था, जिनमें जांच एजेंसी पहले ही उसके खिलाफ आरोपपत्र (Chargesheet) दाखिल कर चुकी है। इसके अतिरिक्त, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी अपने एक मामले में उसके खिलाफ अभियोजन शिकायत (Prosecution Complaint) दर्ज कराई है।
विदेश से संचालित होता था देश का सबसे बड़ा बेटिंग नेटवर्क
छत्तीसगढ़ सरकार के औपचारिक अनुरोध पर सीबीआई ने महादेव ऑनलाइन बुक मामले की विस्तृत जांच अपने हाथों में ली थी। जांच एजेंसी के खुलासे के अनुसार, यह देश के सबसे विशाल और सुनियोजित अवैध ऑनलाइन सट्टेबाजी सिंडिकेट्स में से एक था, जिसका पूरा संचालन विदेश की धरती से किया जा रहा था। इस अवैध डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए क्रिकेट, फुटबॉल, ताश के खेलों और अन्य आयोजनों पर बड़े पैमाने पर ऑनलाइन सट्टा लगवाया जाता था। जांच में पाया गया कि फ्रेंचाइजी मॉडल पर आधारित पैनलों और शाखाओं का एक बड़ा जाल देश के विभिन्न राज्यों में बिछाया गया था, जिनके माध्यम से आम लोगों को सट्टेबाज़ी की ओर आकर्षित कर उनसे दांव की मोटी रकमें वसूली जाती थीं।
हवाला और म्यूल खातों से विदेशों में भेजी जाती थी काली कमाई
सीबीआई की गहन तफ्तीश में अवैध सट्टेबाजी से अर्जित काली कमाई को ठिकाने लगाने की साजिश का पर्दाफाश हुआ है। एजेंसी के अनुसार, इस अवैध धन को सबसे पहले बड़ी संख्या में फर्जी और म्यूल (Mule) बैंक खातों में घुमाया जाता था। इसके बाद हवाला नेटवर्क के जरिए इस भारी-भरकम राशि को विदेशों में ट्रांसफर कर दिया जाता था। सीबीआई ने यह गंभीर आरोप भी लगाया है कि इस काली कमाई का एक बड़ा हिस्सा कुछ लोक सेवकों को संरक्षण राशि (प्रोटेक्शन मनी) के रूप में घूस के तौर पर दिया जाता था, ताकि यह सट्टेबाजी सिंडिकेट बिना किसी रुकावट के निर्बाध रूप से अपना कारोबार चला सके।
इस मामले में सीबीआई ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act, 1988), भारतीय दंड संहिता (IPC) की आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़ी धाराओं के साथ-साथ छत्तीसगढ़ जुआ (प्रतिषेध) अधिनियम के तहत आरोपपत्र दाखिल किए हैं।








