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November 2, 2026 7:05 pm

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भारत के सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा लिंग और लैंगिक पहचान से जुड़ा विवाद, वुमेन्स डिक्लेरेशन इंटरनेशनल ने दायर की याचिका

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नई दिल्ली । जैविक लिंग (Sex) और लैंगिक पहचान (Gender Identity) के बीच के अंतर को लेकर पश्चिमी देशों में जारी बहस अब भारत के सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक पहुंच गई है। ‘वुमेन्स डिक्लेरेशन इंटरनेशनल इंडिया’ (WDII) द्वारा दायर एक याचिका में यह तर्क दिया गया है कि लिंग प्राकृतिक रूप से द्विध्रुवीय (Binary) है और इसे सर्जरी, हार्मोन थेरेपी या स्व-पहचान (Self-identification) के माध्यम से बदला नहीं जा सकता।

याचिका में कहा गया है कि लैंगिक पहचान की कानूनी मान्यता मिलने मात्र से किसी व्यक्ति को महिलाओं को मिलने वाले संवैधानिक और वैधानिक संरक्षण का अधिकार नहीं मिल जाता। केरल में दो ट्रांसजेंडर महिलाओं द्वारा महिलाओं के लिए आरक्षित पंचायत सीटों पर चुनाव लड़ने, महिलाओं के लिए निर्दिष्ट पदों पर भर्ती, महिला खेलों में भागीदारी, महिला हॉस्टलों में प्रवेश और महिला जेलों में स्थानांतरण जैसे उदाहरणों का हवाला देते हुए याचिका में गहरी चिंता व्यक्त की गई है। इस याचिका में न केवल संसद द्वारा पास किए गए ट्रांसजेंडर कानून के 2026 के संशोधनों को चुनौती दी गई है, बल्कि 2019 के ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम और 2014 के ऐतिहासिक ‘नाल्सा’ (NALSA) फैसले पर भी सवाल उठाए गए हैं।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागछी और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस मामले पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए याचिका को इस संबंध में लंबित अन्य याचिकाओं के साथ संबद्ध कर दिया है। 2019 के अधिनियम ने व्यक्तियों को अपनी स्व-महसूस की गई लैंगिक पहचान चुनने का अधिकार दिया था, लेकिन मार्च 2026 के हालिया संशोधनों के बाद स्व-पहचान के स्थान पर मेडिकल बोर्ड के समक्ष पेश होने और मजिस्ट्रेट से प्रमाण पत्र प्राप्त करने की व्यवस्था अनिवार्य कर दी गई है।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों ने भारत में ट्रांस-एक्सक्लूजनरी रेडिकल फेमिनिस्ट (TERF) विचारधारा के प्रभाव पर चिंता जताई है। वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल के अनुसार, भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में ट्रांसजेंडर समुदाय की सदैव एक विशिष्ट और स्वीकार्य उपस्थिति रही है, और इस प्रकार के विवादों का उठना भारतीय परिप्रेक्ष्य में एक नया मोड़ है। सुप्रीम कोर्ट में इस याचिका के जुड़ने से अब देश में महिला अधिकारों और ट्रांसजेंडर अधिकारों के संतुलन को लेकर एक नई कानूनी और सामाजिक बहस छिड़ गई है।

Rajesh Bhagtani
Author: Rajesh Bhagtani

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