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June 10, 2026 2:09 am

“‘-10°C में भी नंगे बदन तपस्या: ध्यान में सांसें थमने का दावा, 15 दिन बाद होता है अंतिम संस्कार”

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यह दावा बेहद संवेदनशील और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे तथ्य के रूप में नहीं बल्कि एक कथित/आस्था आधारित विवरण के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

कई साधु-संतों और योग साधकों से जुड़ी परंपराओं में यह कहा जाता है कि अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी गहन ध्यान और तपस्या की जाती है। इसी क्रम में कुछ कथित कथाओं और लोकमान्यताओं में यह दावा सामने आता है कि -10°C जैसी अत्यधिक ठंड में भी साधक नंगे शरीर तपस्या करते हैं और ध्यान की अवस्था इतनी गहरी हो जाती है कि सांसों की गति अत्यंत धीमी या लगभग स्थिर मानी जाती है।

इन कथाओं में यह भी कहा जाता है कि कुछ विशेष आध्यात्मिक परंपराओं में साधक की मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार तुरंत नहीं किया जाता, बल्कि एक निश्चित अवधि—जैसे 10 से 15 दिन—तक प्रतीक्षा की जाती है। इस दौरान इसे ध्यान, समाधि या आध्यात्मिक अवस्था से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है और यह मुख्य रूप से आस्था, विश्वास और परंपरागत मान्यताओं पर आधारित है।

विशेषज्ञों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार, अत्यधिक ठंड में बिना सुरक्षा के लंबे समय तक रहना मानव शरीर के लिए अत्यंत खतरनाक हो सकता है और इससे हाइपोथर्मिया जैसी गंभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए ऐसे दावों को शाब्दिक रूप में नहीं बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कथाओं के संदर्भ में समझना जरूरी है।

आज के समय में भी हिमालयी क्षेत्रों और साधना परंपराओं को लेकर कई रहस्यमयी कहानियां प्रचलित हैं, जो लोगों की जिज्ञासा का विषय बनी रहती हैं। लेकिन इन सभी को वैज्ञानिक तथ्यों से अलग, आस्था और लोककथाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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