नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व राज्यसभा सांसद महेश जेठमलानी ने सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति संजय किशन कौल के हालिया दावों और उनकी मंशा को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उन्होंने न्यायमूर्ति कौल के कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास के साथ कथित संबंधों, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के पदभार संभालने के घटनाक्रम और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामले में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वैधता पर चल रही सुनवाई के बीच संभावित संबंधों की ओर ध्यान दिलाया है। जेठमलानी ने इन घटनाक्रमों के समय और उनके संदर्भ को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
दरअसल, न्यायमूर्ति एसके कौल ने हाल ही में एक साक्षात्कार में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को लेकर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि कॉलेजियम की ओर से नामों पर औपचारिक निर्णय लिए जाने से पहले ही पूर्व सीजेआई प्रस्तावित नामों को लेकर सरकार के साथ चर्चा कर लिया करते थे। इन दावों पर प्रतिक्रिया देते हुए जेठमलानी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर न्यायमूर्ति कौल को संबोधित करते हुए लिखा कि न्यायिक स्वतंत्रता एक संवैधानिक सिद्धांत है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश का स्वयं यह दावा करना कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान स्वतंत्रता के साथ काम किया, उचित नहीं है। उनके अनुसार, किसी न्यायाधीश के कामकाज और स्वतंत्रता का आकलन जनता पर छोड़ देना चाहिए, जो उनके फैसलों के आधार पर अपनी राय बना सकती है।
जेठमलानी ने न्यायमूर्ति कौल के संस्मरणों और उनके दावों के सार्वजनिक होने के समय पर भी संदेह जताया। उनका कहना है कि इन संस्मरणों का सामने आना ऐसे समय में हुआ है, जब सुप्रीम कोर्ट में निर्वाचन आयोग के भीतर कथित मतभेदों और आयोग की ओर से शुरू की गई कुछ प्रक्रियाओं की वैधता से जुड़े मामलों पर सुनवाई होनी है। उन्होंने इस समय को महत्वपूर्ण बताते हुए सवाल किया कि क्या इन टिप्पणियों का लंबित न्यायिक कार्यवाही पर किसी तरह का प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, ये सवाल और आशंकाएं जेठमलानी की ओर से व्यक्त किए गए विचार हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक समूह एसआईआर प्रक्रिया को लेकर न्यायपालिका पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं। उनके दावे के मुताबिक, इस प्रक्रिया के तहत कथित फर्जी मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाए जाने के कारण वामपंथी और कट्टरपंथी मुस्लिमवादी समूह नाराज हैं। उन्होंने कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के कुछ दलों का भी उल्लेख किया। जेठमलानी ने इन समूहों पर न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करने का आरोप लगाया, हालांकि उनके इन दावों के समर्थन में खबर में कोई स्वतंत्र पुष्टि प्रस्तुत नहीं की गई है।
जेठमलानी ने न्यायमूर्ति कौल के पिछले वर्ष सौरव दास की दिवाली पार्टी में शामिल होने का भी जिक्र किया और इसे हैरान करने वाला घटनाक्रम बताया। उन्होंने कहा कि इसके तुरंत बाद, उसी वर्ष नवंबर में न्यायमूर्ति सूर्यकांत के भारत के मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद उनके खिलाफ एक तीखी व्यक्तिगत टिप्पणी वाला लेख पत्रिका ‘कारवां’ में प्रकाशित हुआ था। जेठमलानी के अनुसार, यह लेख पहली बार वर्ष 2019 में भी इसी पत्रिका में प्रकाशित हुआ था, जब न्यायमूर्ति सूर्यकांत को सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया था। उन्होंने इन घटनाओं का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति कौल और सौरव दास के संबंधों को लेकर सवाल उठाए।
वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना है कि सौरव दास की एसआईआर और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के विरोध से जुड़ी गतिविधियों को देखते हुए उनके साथ न्यायमूर्ति कौल के संबंधों की प्रकृति पर सवाल उठना स्वाभाविक है। उन्होंने इस संदर्भ में न्यायमूर्ति कौल के सामने दो प्रमुख प्रश्न रखे। पहला, क्या उनके वक्तव्यों के माध्यम से न्यायपालिका के सदस्यों को यह संकेत दिया जा रहा है कि वे एसआईआर की वैधता, निर्वाचन आयोग के भीतर कथित मतभेदों और इस प्रक्रिया की कानूनी स्थिति से जुड़े मामलों में सरकार के खिलाफ फैसला सुनाएं? दूसरा, क्या सुप्रीम कोर्ट का कोई पूर्व न्यायाधीश अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर शीर्ष अदालत में लंबित किसी महत्वपूर्ण मामले के संभावित फैसले को प्रभावित करने का प्रयास कर रहा है?
इन सवालों के जरिए जेठमलानी ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता, लंबित मामलों पर सार्वजनिक टिप्पणियों के प्रभाव और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े व्यक्तियों के साथ पूर्व न्यायाधीशों के संबंधों को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। हालांकि, न्यायमूर्ति कौल या संबंधित पक्षों की ओर से इन विशिष्ट आरोपों और सवालों पर कोई प्रतिक्रिया इस समाचार में शामिल नहीं है।








