कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को दिल्ली में हिरासत में लिए जाने के बाद कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अदालत से राहत मिल गई है। तीनों नेताओं को करीब 23 से 24 घंटे हिरासत में रखे जाने के बाद रिहा कर दिया गया। हालांकि, उनकी रिहाई के साथ एक अहम शर्त भी जुड़ी है। उन्हें अगले एक साल तक शांति भंग नहीं करने और अच्छे व्यवहार की शर्त का पालन करना होगा।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तीनों नेताओं को 10 अक्टूबर को दिल्ली में उस समय हिरासत में लिया गया था, जब वे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन में शामिल होने के लिए पहुंचे थे। पुलिस ने उन्हें दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर विमान से उतरने के बाद हिरासत में लिया था। इस कार्रवाई के बाद पार्टी से जुड़े अन्य लोगों और समर्थकों के बीच भी हलचल तेज हो गई थी।
रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस ने संभावित कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए एहतियाती कार्रवाई की थी। इसके बाद तीनों को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। अदालत ने निर्धारित शर्तों के साथ उनकी रिहाई का आदेश दिया। खबरों में बताया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए 50 हजार रुपये के मुचलके की शर्त भी रखी गई थी। रिहाई की प्रमुख शर्त अगले 12 महीनों तक शांति बनाए रखना और अच्छा व्यवहार करना है।
दरअसल, CJP की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन की घोषणा की गई थी। पार्टी के नेताओं का कहना था कि वे चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों को लेकर अपनी मांगें उठाना चाहते हैं। इसी प्रस्तावित प्रदर्शन के बीच दिल्ली पुलिस ने तीनों नेताओं को हिरासत में लिया। उनकी हिरासत के बाद मामले ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा का रूप ले लिया।
तीनों नेताओं की रिहाई के बाद अब इस बात पर नजर रहेगी कि CJP अपने प्रस्तावित आंदोलन को किस तरह आगे बढ़ाती है। पार्टी के अन्य नेताओं ने प्रदर्शन जारी रखने की बात कही है। हालांकि, आगे की रणनीति और कार्यक्रमों को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित नेताओं की आधिकारिक घोषणाओं से ही स्पष्ट होगी।
इस पूरे मामले में फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को अदालत से रिहाई मिल गई है, लेकिन उन्हें एक साल तक शांति भंग नहीं करने की शर्त का पालन करना होगा। यह मामला एक बार फिर प्रदर्शन, कानून-व्यवस्था और विरोध दर्ज कराने के अधिकार को लेकर चर्चा में है।








