
हे चेतना के पुत्र ! पक्षी अपने नीड़ की कामना करता है और बुलबुल गुलाब के सौंदर्य की, जबकि मानवात्मा रूपी पखेरू क्षणभंगुर धूल से

हे मनुष्य की संतानो ! क्या तुम यह नहीं जानते कि हमने तुम सबको एक ही मिट्टी से क्यों पैदा किया ? इसलिये कि कोई

हे चेतना के पुत्र ! मेरी दृष्टि में सर्वाधिक प्रिय वस्तु है न्याय ! तुझे यदि मेरी अभिलाषा है तो उससे विमुख न हो और

“ऐ लोगो ! ऐसा कोई भी काम न करो जिससे तुम्हें लज्जित होना पड़े अथवा लोगों की दृष्टि में प्रभुधर्म का अपमान हो। तुम षड्यंत्र


“जंगली जानवरों की तरह व्यवहार करना मनुष्यों को शोभा नहीं देता। जो गुण उसके सम्मान के योग्य हैं वे हैं सहनशीलता, दया, प्रेम, सहानुभूति और

“जिज्ञासु को सदैव प्रभु में विश्वास रखना चाहिये, संसार के लोगों से मोह त्याग कर धूल-सरीखे संसार से अनासक्त होकर, स्वामियों के स्वामी से प्रेम

“इस पार्थिव जीवन का नाश निश्चित है, इसकी खुशियाँ समाप्त होना बिल्कुल तय है और इससे पहले कि तू ईश्वर के पास पश्चाताप की पीड़ा

“अपनी परीक्षा कीघड़ियों में विलाप न कर, न ही आनंद मना। तू मध्यम मार्ग अपनाने की चेष्टा कर। अपनी व्यथाओं में मेरा स्मरण कर और

“तुम इस सत्य को जानो कि शरीर से अलग होने पर भी आत्मा तब तक प्रगति करती जायेगी जब तक वह परमात्मा से एक ऐसी
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