नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दो से अधिक बच्चे होने के आधार पर लोगों को पंचायत चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानूनों की मौजूदा प्रासंगिकता पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि देश में प्रजनन दर लगातार घट रही है और पिछले दो दशकों के दौरान भारत की जनसांख्यिकीय परिस्थितियों में व्यापक बदलाव आया है। ऐसे में दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों की उपयोगिता और औचित्य पर दोबारा विचार किए जाने की आवश्यकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में ऐसे प्रावधान शायद अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने यह टिप्पणी महाराष्ट्र के काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। मंगला भीमराव को तीसरा बच्चा होने के आधार पर पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अयोग्यता को रद्द करते हुए महाराष्ट्र के संबंधित कानून के तहत उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही पर भी रोक लगा दी।
प्रजनन दर में गिरावट का दिया हवाला
अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि पिछले दो दशकों में भारत की जनसंख्या संबंधी परिस्थितियों में बड़ा परिवर्तन आया है। पहले जनसंख्या वृद्धि और संभावित जनसंख्या विस्फोट को लेकर जो चिंताएं थीं, मौजूदा जनसांख्यिकीय आंकड़े अब वैसी स्थिति नहीं दर्शाते। देश में कुल प्रजनन दर में लगातार गिरावट दर्ज की गई है और यह पहले के लगभग तीन बच्चों प्रति महिला के स्तर से घटकर 1.9 तक पहुंच गई है।
पीठ ने कहा कि बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों को देखते हुए दो से अधिक बच्चे होने पर पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों की वर्तमान उपयोगिता की समीक्षा जरूरी है। अदालत के अनुसार, जब इन कानूनों को लागू किया गया था, तब देश के सामने जनसंख्या नियंत्रण एक महत्वपूर्ण नीतिगत चुनौती थी, लेकिन अब परिस्थितियां पहले जैसी नहीं हैं।
2003 के फैसले की होगी बड़ी पीठ में समीक्षा
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2003 में जावेद बनाम हरियाणा सरकार मामले में दिए गए अपने फैसले पर भी पुनर्विचार की आवश्यकता जताई। अदालत ने इस मामले को आगे की समीक्षा के लिए बड़ी पीठ के पास भेज दिया है। वर्ष 2003 में तीन न्यायाधीशों की पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान को संवैधानिक रूप से सही ठहराया था, जिसके तहत दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर किसी व्यक्ति को पंचायत चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित किया जा सकता था।
उस समय अदालत ने संबंधित प्रावधान को जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से उचित माना था। अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बदलते सामाजिक और जनसांख्यिकीय परिदृश्य में उस फैसले की दोबारा समीक्षा की जरूरत है। बड़ी पीठ इस मामले में पहले दिए गए फैसले और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं पर विचार करेगी।
पहले जनसंख्या नियंत्रण था प्रमुख नीतिगत मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब जावेद मामले में फैसला सुनाया गया था, उस समय भारत की कुल प्रजनन दर लगभग तीन बच्चे प्रति महिला थी। उस दौर में बढ़ती आबादी को नियंत्रित करना सरकार की प्रमुख नीतिगत प्राथमिकताओं में शामिल था। इसी पृष्ठभूमि में पंचायत चुनाव लड़ने के लिए दो बच्चों की सीमा निर्धारित करने वाले प्रावधान को उचित ठहराया गया था।
हालांकि, बीते वर्षों में देश की जनसंख्या संबंधी स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। विभिन्न जनसांख्यिकीय संकेतक प्रजनन दर में लगातार गिरावट की ओर इशारा करते हैं। अदालत ने इन्हीं बदलावों को ध्यान में रखते हुए कहा कि पुराने कानूनों और न्यायिक फैसलों की मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप समीक्षा की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी और मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने के फैसले से दो से अधिक बच्चों के आधार पर पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनी प्रावधानों पर नई बहस शुरू होने की संभावना है। हालांकि, इस संबंध में अंतिम कानूनी स्थिति बड़ी पीठ द्वारा की जाने वाली समीक्षा और उसके फैसले के बाद ही स्पष्ट होगी।








