दुनिया के कई हिस्सों में इस समय भीषण गर्मी और हीटवेव ने जनजीवन को प्रभावित किया है। जहां चीन के कुछ इलाकों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने के बावजूद हालात अपेक्षाकृत नियंत्रित नजर आए, वहीं यूरोप में 43 डिग्री सेल्सियस की गर्मी ने कई देशों में जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर कम तापमान के बावजूद यूरोप ज्यादा परेशान क्यों हुआ?
विशेषज्ञों के अनुसार, इसका जवाब सिर्फ तापमान में नहीं बल्कि भौगोलिक स्थिति, इन्फ्रास्ट्रक्चर और जीवनशैली में छिपा है।
यूरोप में क्यों दिखा ज्यादा असर?
यूरोप के कई देशों में पारंपरिक रूप से इतनी अधिक गर्मी का अनुभव नहीं होता। वहां के घरों, इमारतों और सार्वजनिक ढांचे को भारी हीटवेव के हिसाब से डिजाइन नहीं किया गया है। अधिकांश घरों में एयर कंडीशनिंग की सुविधा सीमित होती है, जिससे तापमान बढ़ने पर लोग जल्दी प्रभावित होते हैं।
इसके अलावा, यूरोप में जनसंख्या का बड़ा हिस्सा शहरी इलाकों में रहता है, जहां हीट आइलैंड इफेक्ट के कारण तापमान और ज्यादा महसूस होता है।
चीन कैसे संभला ज्यादा तापमान में?
चीन के कई हिस्सों में गर्मी की समस्या पहले से आम है। वहां की इमारतें और इंफ्रास्ट्रक्चर लंबे समय से अत्यधिक तापमान को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं। साथ ही, एयर कंडीशनिंग और कूलिंग सिस्टम का व्यापक उपयोग भी स्थिति को संभालने में मदद करता है।
इसके अलावा, चीन में हीटवेव के लिए पहले से अलर्ट सिस्टम और आपदा प्रबंधन ढांचा भी ज्यादा मजबूत माना जाता है।
नमी और हवा की भूमिका भी अहम
विशेषज्ञ बताते हैं कि केवल तापमान ही नहीं, बल्कि ह्यूमिडिटी (नमी) भी गर्मी के असर को बढ़ा देती है। यूरोप के कई हिस्सों में गर्मी के साथ नमी भी अधिक होती है, जिससे शरीर को ठंडा रहना मुश्किल हो जाता है।
वहीं कुछ इलाकों में सूखी गर्मी होने के कारण तापमान अधिक होने के बावजूद असर अपेक्षाकृत कम महसूस होता है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाता है बड़ा फर्क
हीटवेव के प्रभाव को समझने में यह भी महत्वपूर्ण है कि कोई देश अपने नागरिकों के लिए कैसी व्यवस्था रखता है। जहां मजबूत कूलिंग सिस्टम, बिजली सप्लाई और स्वास्थ्य सुविधाएं होती हैं, वहां लोग अधिक तापमान को भी बेहतर तरीके से झेल पाते हैं।
क्या है वैज्ञानिक निष्कर्ष?
वैज्ञानिकों के अनुसार, गर्मी का असर केवल डिग्री सेल्सियस पर निर्भर नहीं करता। यह कई कारकों—जैसे नमी, हवा, शहरी संरचना और तैयारियों—पर आधारित होता है। यही कारण है कि कभी-कभी कम तापमान भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है।
क्या है पूरा मामला?
हाल के दिनों में यूरोप और चीन में आई भीषण गर्मी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अलग-अलग देशों में समान या अलग तापमान के बावजूद असर इतना भिन्न क्यों होता है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका मुख्य कारण भौगोलिक परिस्थितियां, इन्फ्रास्ट्रक्चर और जीवनशैली है, जो मिलकर हीटवेव के प्रभाव को तय करती हैं।








