नई दिल्ली। देश के चार प्रमुख राज्यों—उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की 28 विधान परिषद (MLC) सीटों पर हुए द्विवार्षिक चुनावों में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है। पार्टी केवल एक सीट पर जीत दर्ज करने में सफल रही, जिससे उसका जीत प्रतिशत महज 3.57 प्रतिशत रह गया। हालांकि, महाराष्ट्र के नागपुर विभाग स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से मिली एकमात्र जीत ने पार्टी को सभी राज्यों में पूरी तरह ‘शून्य’ होने के बड़े राजनीतिक झटके और शर्मिंदगी से बचा लिया है।
नागपुर में अभिजीत वांजारी ने बचाई साख राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का गढ़ माने जाने वाले नागपुर में कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी अभिजीत वांजारी ने अपनी सीट बरकरार रखी। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार सुधाकर कोहले को 3,271 वोटों के कड़े अंतर से हराया। मतगणना के शुरुआती दौर में पिछड़ने के बाद वांजारी ने दूसरी वरीयता के वोटों के सहारे निर्णायक बढ़त हासिल की और जीत दर्ज की। इस जीत के आधार पर कांग्रेस अब यह दावा कर सकती है कि शिक्षित और स्नातक वर्ग में उसका आधार बरकरार है।
कर्नाटक और बिहार में गहराया संकट कर्नाटक में सत्तारूढ़ होने के बावजूद कांग्रेस का पूरी तरह सूपड़ा साफ हो गया, जहां भाजपा-जेडीएस गठबंधन ने सभी चार सीटों पर क्लीन स्वीप किया। विशेष रूप से बेंगलुरु शिक्षक सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता पुट्टन्ना को जेडीएस उम्मीदवार ए.पी. रंगनाथ के हाथों 908 वोटों से मिली हार को पार्टी के लिए बेहद निराशाजनक माना जा रहा है। वहीं, बिहार के दरभंगा शिक्षक क्षेत्र में दो बार के एमएलसी और कांग्रेस उम्मीदवार मदन मोहन झा को प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के डॉ. सुरेश प्रसाद राय ने शिकस्त दी। बिहार में राजद द्वारा अलग उम्मीदवार उतारे जाने से इंडिया (INDIA) गठबंधन के वोटों में हुए बिखराव ने भी कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचाया।
इन नतीजों ने क्षेत्रीय सहयोगियों की तुलना में कांग्रेस के जनाधार पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जहां यूपी में समाजवादी पार्टी (5 सीटें), महाराष्ट्र में एनसीपी-शरद पवार गुट (2 सीटें) और बिहार में राजद जैसे दलों ने कांग्रेस की तुलना में काफी बेहतर प्रदर्शन किया है।








