जयपुर । राजस्थान हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए पत्नी की मेडिकल स्थिति और वेतन से जुड़ी निजी जानकारी जुटाने के लिए बार-बार आरटीआई (RTI) आवेदन करने को ‘मानसिक क्रूरता’ माना है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी के पक्ष में दिए गए तलाक के निर्णय को पूरी तरह सही ठहराते हुए इसके खिलाफ पति द्वारा दायर की गई अपील को खारिज कर दिया है।
न्यायाधीश इंद्रजीत सिंह और न्यायाधीश संगीता शर्मा की खंडपीठ ने आरटीआई के दुरुपयोग के अलावा पत्नी पर सहकर्मियों के साथ संबंधों के निराधार और झूठे आरोप लगाने, उसका एटीएम कार्ड अपने पास रखकर पूरा वेतन खुद निकाल लेने तथा गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल व भोजन न देने जैसे कृत्यों को भी गंभीर मानसिक और शारीरिक क्रूरता के दायरे में माना है।
फैमिली कोर्ट के फैसले को दी गई थी चुनौती
जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (JVVNL) में सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत पत्नी ने फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल करते हुए प्रताड़ना का आरोप लगाया था। उन्होंने शिकायत में बताया था कि विवाह के बाद से ही उन्हें लगातार मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। गर्भावस्था के दौरान उन्हें ठीक से भोजन और उचित देखभाल नहीं दी जाती थी। इसके साथ ही, पति उनके सहकर्मियों के साथ अनुचित संबंधों के झूठे आरोप लगाते थे, उनके साथ मारपीट करते थे, उनका एटीएम कार्ड अपने पास रखकर पूरा वेतन खुद निकाल लेते थे और उनके विभाग में लगातार आरटीआई (RTI) लगाकर उनकी निजी जानकारियां जुटाते थे ताकि उनकी सामाजिक और पेशेवर प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई जा सके। फैमिली कोर्ट ने 29 अप्रैल 2024 को इन सभी साक्ष्यों के आधार पर पत्नी के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित की थी, जिसे पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
विभाग में नीचा दिखाने के लिए किया गया आरटीआई का इस्तेमाल
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पति द्वारा पत्नी की मेडिकल स्थिति, वेतन और अन्य व्यक्तिगत मामलों की जानकारी हासिल करने के लिए लगातार आरटीआई अधिनियम, 2005 के तहत आवेदन करना तथा पुलिस एवं उच्च अधिकारियों को शिकायतें भेजना स्पष्ट रूप से पत्नी की प्रतिष्ठा को विभाग में नीचा दिखाने के दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से किया गया था, जो कि स्पष्ट रूप से ‘मानसिक क्रूरता’ है।
अदालत ने यह भी माना कि गर्भकाल के दौरान पत्नी की देखभाल न करना और उसे ठीक से भोजन उपलब्ध न कराना भी एक गंभीर अमानवीय कृत्य है। खंडपीठ ने इस महत्वपूर्ण तथ्य पर विशेष जोर दिया कि दोनों पक्ष वर्ष 2018 से लगातार अलग-रह रहे हैं और उनके बीच का वैवाहिक बंधन पूरी तरह से टूट चुका है, तथा भविष्य में उनके बीच पुनर्मिलन की कोई भी वास्तविक संभावना नहीं बची है। ऐसे हालात में दोनों पक्षों को जबरन इस वैवाहिक रिश्ते में बंधे रहने के लिए बाध्य करना उनके साथ और अधिक क्रूरता होगी। इन तमाम पहलुओं का बारीकी से विश्लेषण करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि फैमिली कोर्ट का निर्णय पूरी तरह से न्यायसंगत और साक्ष्यों पर आधारित था।








