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June 7, 2026 7:34 pm

धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा: जल, जंगल और जमीन के अधिकारों के महानायक

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 व्यक्तित्व : धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा

 

जन्म : 15 नवम्बर 1875। मृत्यु : 9 जून 1900

 

धरती आबा एक सामान्य गरीब परिवार में जन्म लेकर, अभावों के बीच रहकर भी किसी का भगवान हो जाना कोई सामान्य बात नहीं है। लेकिन मात्र 25 वर्ष के जीवन काल में तमाम अभाव, मानसिक और शारीरिक यातनाओं के बीच अपने बचपन से लेकर भगवान बनने तक की इस यात्रा को बिरसा मुंडा ने पूरा किया। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में उन्होंने आदिवासी समाज की दशा और दिशा बदलकर नए सामाजिक युग का सूत्रपात किया तो साथ ही, शौर्य की नई गाथा भी लिखी। आदिवासियों ने भी उन्हें सिर्फ नायक नहीं, बल्कि धरती आबा यानी धरती के पिता के साथ भगवान का दर्जा भी दिया।

                             जल,जंगल और जमीन को लेकर आदिवासियों का संघर्ष सदियों पुराना है। है। 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में भी जब भारत गुलामी का दंश झेल रहा था, इसी संघर्ष के बीच 15 नवंबर 1875 को तब के रांची जिले के उलिहातु गांव में सुगना मुंडा के घर एक बालक का जन्म हुआ। कहते हैं, उस दिन बृहस्पतिवार था, इसलिए बालक का नाम बिरसा रखा गया। घर की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, बावजूद इसके पिता ने बिरसा को पढ़ने के लिए मिशनरी स्कूल भेजा। बात 1882 की है। एक तरफ गरीबी थी और दूसरी तरफ अंग्रेजों का लाया इंडियन फॉरेस्ट एक्ट। इस एक्ट का दुरुपयोग कर आदिवासियों से उनके जंगल के अधिकार को छीनने की शुरुआत हुई। साल 1890 में 15 वर्ष की आयु में अपनी शिक्षा छोड़ने के बाद बालक बिरसा ने समग्र विचारों को विस्तार से समझने का संकल्प किया। इसके बाद आने वाले 5 साल (1890-95 तक) बालक बिरसा ने धर्म, नीति, दर्शन, वनवासी रीति रिवाज,मुंडानी परंपराओं का गहराई से अध्ययन किया। इसके साथ ही ईसाई धर्म और ब्रिटिश सरकार की नीतियों का भी गहराई से अध्ययन किया। अध्ययन के सार रूप में उन्होंने कहा – ‘साहब-साहब टोपी एक!’ बिरसा ने महसूस किया कि आचरण के धरातल पर आदिवासी समाज अंधविश्वास में फंसा है तो आस्था के मामले में वह भटका हुआ है। धर्म के बिंदु पर आदिवासी कभी मिशनरियों के प्रलोभन में आ जाते हैं तो कभी ढकोसलों को ही ईश्वर मानने लगते हैं। इसके ऊपर था, जमींदारों और ब्रिटिश शासन का शोषण। बिरसा ने तीन स्तरों पर आदिवासी समाज को संगठित किया। पहला, अंधविश्वास और ढकोसलों से दूर होकर स्वच्छता व शिक्षा का रास्ता। दूसरा, सामाजिक स्तर के साथ आर्थिक स्तर पर सुधार। इसके लिए बिरसा ने नेतृत्व की कमान संभाली और ‘बेगारी प्रथा’ के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया। तीसरा, राजनीतिक स्तर पर आदिवासियों को अधिकारों को लेकर सजग

करना। आदिवासियों को बिरसा मुंडा के रूप में अपना नायक मिला।

                              बिरसा ने अंग्रेजों द्वारा लागू की गई जमींदारी और राजस्व-व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई छेड़ी। बिरसा ने सूदखोर-महाजनों के खिलाफ भी बगावत की। ये महाजन कर्ज के बदले आदिवासियों की जमीन पर कब्जा कर लेते थे। बिरसा मुंडा के निधन तक चला ये विद्रोह ‘उलगुलान’ नाम से जाना जाता है। अगस्त 1897 में बिरसा ने अपने साथ करीब 400 आदिवासियों को लेकर एक थाने पर हमला बोल दिया। जनवरी 1900 में मुंडा और अंग्रेजों के बीच आखिरी लड़ाई हुई। रांची के पास दूम्बरी पहाड़ी पर हुई इस लड़ाई में हजारों आदिवासियों ने अंग्रेजों का सामना किया, लेकिन तोप और बंदूकों के सामने तीर-कमान जवाब देने लगे। बहुत से लोग मारे गए और कई लोगों को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। बिरसा पर अंग्रेजों ने 500 रुपये का इनाम रखा था। उस समय के हिसाब से ये रकम काफी ज्यादा थी। कहा जाता है कि बिरसा की ही पहचान के लोगों ने 500 रुपये के लालच में उनके छिपे होने की सूचना पुलिस को दे दी। आखिरकार बिरसा चक्रधरपुर से गिरफ्तार कर लिए गए। अंग्रेजों ने उन्हें रांची की जेल में कैद कर दिया। कहा जाता है कि यहां उनको धीमा जहर दिया गया। इसके चलते 9 जून 1900 को वे शहीद हो गए। वर्षों तक किताबों के भीतरी पन्नों या फिर क्षेत्र विशेष तक सिमटी रही बिरसा की इस वीरगाथा को याद दिलाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, “भगवान बिरसा ने समाज के लिए जीवन जिया, अपनी संस्कृति और अपने देश के लिए अपने प्राणों का परित्याग कर दिया। इसलिए, वह आज भी हमारी आस्था में, हमारी भावना में हमारे भगवान के रूप में उपस्थित हैं।”

               प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 नवंबर 2021 को बिरसा मुंडा की शौर्य गाथा का स्मरण कर उनकी याद में पहले संग्रहालय का उद्घाटन किया। साथ ही, इस दिन से पहली बार देश में बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की गई।

                          केंद्र सरकार द्वारा जनजातीय नायक भगवान बिरसा मुंडा के नाम पर ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ (पूर्व में प्रधानमंत्री जन-जाति उत्कर्ष अभियान) चलाया जा रहा है।इस व्यापक योजना का मुख्य उद्देश्य आदिवासी बहुल गांवों और क्षेत्रों में सामाजिक बुनियादी ढांचे,स्वास्थ्य, शिक्षा और आजीविका की स्थिति में सुधार करना है। धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान उद्देश्य देश के 63 हजार से अधिक अनुसूचित जनजाति (ST) बाहुल्य गांवों का समग्र विकास करना है। इसका मुख्य लक्ष्य दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों तक पक्के घर, स्वच्छ पेयजल,शिक्षा,मोबाइल कनेक्टिविटी और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाना है।

        छात्रवृत्ति और शैक्षिक योजनाएं,

अनुसूचित जनजातियों के लिए राष्ट्रीय फेलोशिप (NFST): पीएचडी कर रहे मेधावी एसटी छात्रों को पूर्ण वित्तपोषित सहायता।

राष्ट्रीय विदेशी छात्रवृत्ति योजना (NOS) : विदेशों के प्रमुख विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए मेधावी छात्रों को वित्तीय सहायता।

 

 

विभिन्न राज्य सरकारें भी बिरसा मुंडा के नाम पर कई कल्याणकारी योजनाएं चला रही हैं।

 

महाराष्ट्र : भगवान बिरसा मुंडा जोड़ रास्ते (सड़क) योजना, जिसके तहत सभी आदिवासी बस्तियों को मुख्य सड़कों से जोड़ा जा रहा है。

 

मध्यप्रदेश : भगवान बिरसा मुंडा स्वरोजगार योजना: इसके तहत अनुसूचित जनजाति वर्ग के युवाओं को अपना खुद का उद्योग,व्यापार या सेवा इकाई स्थापित करने के लिए बैंकों से 1 लाख से लेकर 50 लाख तक का ऋण उपलब्ध कराया जाता है, जिस पर राज्य सरकार द्वारा ब्याज अनुदान दिया जाता है।

 

गोवा : गोवा में ‘भगवान बिरसा मुंडा लक्ष्य सिद्धि योजना’,प्रतिभाशाली आदिवासी छात्रों को व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

       झारखंड (बिरसा मुंडा की जन्म भूमि) 

बिरसा हरित ग्राम योजना: इस योजना के तहत राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों और किसानों की आय बढ़ाने के लिए फलदार पौधे लगाने हेतु जमीन और सहायता प्रदान की जाती है।

बिरसा मुंडा आवास योजना : राज्य के विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों के बेघर लोगों को पक्के आवास उपलब्ध कराने के लिए यह योजना चलाई जा रही है।

 

           मोहर सिंह सलावद,

शिक्षाविद्,विचारक,आलोचक,लेखक एवं प्राध्यापक,स्कूल शिक्षा,राजस्थान।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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