नई दिल्ली: आज भले ही खाड़ी देशों—जैसे कुवैत, कतर, बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात—की अपनी मजबूत मुद्राएं (दीनार, रियाल, दिरहम) हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब इन देशों में भारतीय रुपया ही आधिकारिक तौर पर चलता था। यह सुनकर भले हैरानी हो, लेकिन यह इतिहास का एक अहम और दिलचस्प अध्याय है।
क्यों चलता था भारतीय रुपया?
दरअसल, 20वीं सदी के मध्य तक ये खाड़ी देश पूरी तरह विकसित राष्ट्र नहीं थे और कई जगहों पर ब्रिटिश प्रभाव था। उस समय भारत भी ब्रिटिश भारत का हिस्सा था और यहां की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत संगठित थी।
इन खाड़ी क्षेत्रों में व्यापार, खासकर तेल से पहले के दौर में, भारत के साथ काफी होता था। भारतीय व्यापारी और मजदूर बड़ी संख्या में यहां काम करते थे। ऐसे में लेन-देन के लिए भारतीय रुपया सबसे सुविधाजनक और विश्वसनीय मुद्रा बन गया।
RBI छापता था खास नोट
इस दौर में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) खाड़ी देशों के लिए विशेष प्रकार के नोट भी जारी करता था, जिन्हें “गुल्फ रुपी” कहा जाता था। यह भारतीय रुपये का ही एक संस्करण था, जिसका उपयोग खासतौर पर खाड़ी क्षेत्रों में होता था ताकि भारत की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव न पड़े।
अपनी करेंसी क्यों नहीं थी?
उस समय कुवैत, कतर और अन्य खाड़ी देश छोटे-छोटे प्रशासनिक क्षेत्रों के रूप में थे, जहां न तो मजबूत केंद्रीय बैंक थे और न ही स्वतंत्र आर्थिक ढांचा।
- आर्थिक गतिविधियां सीमित थीं
- तेल का बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू नहीं हुआ था
- प्रशासनिक नियंत्रण बाहरी शक्तियों के पास था
ऐसे में अपनी मुद्रा जारी करना उनके लिए व्यावहारिक नहीं था। इसलिए उन्होंने भारतीय रुपये को ही अपनाया।
फिर कैसे बदली स्थिति?
1960 के दशक में हालात तेजी से बदले। तेल की खोज और उत्पादन ने इन देशों की किस्मत बदल दी।
जब भारत ने 1966 में रुपये का अवमूल्यन किया, तो इसका असर खाड़ी देशों पर भी पड़ा। इससे बचने के लिए उन्होंने धीरे-धीरे अपनी अलग मुद्रा शुरू कर दी—जैसे कुवैत दीनार, कतर रियाल आदि।
इसके साथ ही इन देशों ने अपने केंद्रीय बैंक बनाए और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने की दिशा में कदम बढ़ाए।
क्या है इसका महत्व?
यह इतिहास दिखाता है कि एक समय भारतीय रुपये का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव कितना मजबूत था। आज भले ही स्थिति बदल गई हो, लेकिन यह तथ्य भारत के आर्थिक इतिहास की एक खास पहचान है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह दौर भारत और खाड़ी देशों के पुराने आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी दर्शाता है, जो आज भी मजबूत बने हुए हैं।







