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August 27, 2026 5:00 pm

चिल्लूपार: ‘हाता’ की विरासत और ‘मठ’ की सियासत के बीच बसपा का दांव, सपा-बीजेपी के सामने चला ‘ठाकुर कार्ड’

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उत्तर प्रदेश की चिल्लूपार विधानसभा सीट पर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। गोरखपुर की यह सीट लंबे समय से स्थानीय राजनीतिक प्रभाव, जातीय समीकरण और बड़े नेताओं की विरासत के कारण चर्चा में रही है। अब बहुजन समाज पार्टी ने यहां अस्मिता चंद को आधिकारिक प्रत्याशी घोषित कर मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।

बसपा का यह फैसला ऐसे समय आया है जब चिल्लूपार में भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी भी अपने-अपने राजनीतिक समीकरण मजबूत करने में जुटी हैं। अस्मिता चंद इससे पहले भाजपा से जुड़ी रही हैं और अगस्त 2026 में उन्होंने भाजपा से दूरी बनाकर बसपा का रुख किया। अब बसपा की ओर से उनकी उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा ने चुनावी गणित को नया मोड़ दे दिया है।

‘हाता’ की विरासत बनाम ‘मठ’ का प्रभाव

चिल्लूपार की राजनीति में हरिशंकर तिवारी परिवार की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। क्षेत्र की राजनीति में ‘हाता’ और ‘मठ’ के प्रभाव की चर्चा अक्सर होती रही है। यही वजह है कि चिल्लूपार का चुनाव केवल उम्मीदवारों की लड़ाई नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीतिक विरासत और अलग-अलग सामाजिक समीकरणों की परीक्षा के तौर पर भी देखा जाता है।

2022 के चुनाव में भाजपा के राजेश त्रिपाठी ने जीत दर्ज की थी। उन्हें 96,777 वोट मिले थे, जबकि समाजवादी पार्टी के विनय शंकर को 75,132 वोट मिले। बसपा के राजेंद्र सेही 45,729 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे।

बसपा ने क्यों खेला ‘ठाकुर कार्ड’?

चिल्लूपार में बसपा का इतिहास भी इस दांव को महत्वपूर्ण बनाता है। पिछले चुनावों में पार्टी ने अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच समीकरण बनाने की कोशिश की है। 2022 के चुनावी विश्लेषणों में भी बसपा की रणनीति को दलित-ठाकुर समीकरण से जोड़कर देखा गया था, जबकि सपा और भाजपा अपने-अपने ब्राह्मण, यादव और अन्य सामाजिक समीकरणों को साधने में जुटी थीं।

इस बार अस्मिता चंद के जरिए बसपा को एक ऐसा चेहरा मिला है, जिसकी भाजपा संगठन में भी राजनीतिक पृष्ठभूमि रही है। यही वजह है कि उनकी उम्मीदवारी को सिर्फ प्रत्याशी बदलने के तौर पर नहीं, बल्कि वोट समीकरणों को प्रभावित करने वाले कदम के रूप में देखा जा रहा है।

भाजपा के सामने नई चुनौती

अस्मिता चंद का बसपा में जाना भाजपा के लिए भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। अगस्त में उनके भाजपा छोड़कर बसपा के साथ जाने की चर्चा ने चिल्लूपार की राजनीति में हलचल पैदा कर दी थी। अब उनकी आधिकारिक उम्मीदवारी से भाजपा को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है।

भाजपा की ओर से क्षेत्र में मौजूदा विधायक राजेश त्रिपाठी का राजनीतिक प्रभाव बना हुआ है। 2022 में उन्होंने करीब 9.5 प्रतिशत के अंतर से जीत हासिल की थी। ऐसे में भाजपा के सामने अपने पुराने समर्थन आधार को बनाए रखने के साथ-साथ बसपा के नए सामाजिक समीकरण का मुकाबला करने की चुनौती होगी।

सपा भी मुकाबले में पीछे नहीं

समाजवादी पार्टी के लिए भी चिल्लूपार महत्वपूर्ण सीट है। 2022 में पार्टी के विनय शंकर तिवारी ने मजबूत प्रदर्शन किया था और भाजपा उम्मीदवार को कड़ी चुनौती दी थी। इस बार सपा की कोशिश होगी कि वह अपने पिछले प्रदर्शन को आधार बनाकर क्षेत्र में अपना समर्थन और मजबूत करे।

चिल्लूपार में मुकाबला इसलिए भी रोचक हो सकता है क्योंकि यहां तीनों प्रमुख दलों के पास अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक आधार हैं। भाजपा सत्ता और संगठन की ताकत के साथ मैदान में है, सपा पिछली चुनौती को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती है और बसपा नए चेहरे के जरिए अपना खोया आधार वापस पाने की रणनीति पर काम कर रही है।

2027 में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार

अस्मिता चंद की उम्मीदवारी के बाद चिल्लूपार में त्रिकोणीय मुकाबले की चर्चा तेज हो गई है। राजनीतिक विश्लेषणों में भी इसे 2027 के दिलचस्प मुकाबलों में शामिल किया जा रहा है। ब्राह्मण वोटों का संभावित बंटवारा, दलित समर्थन और अन्य सामाजिक समूहों का रुख चुनावी परिणाम को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि अभी विधानसभा चुनाव में समय है और सभी दलों के उम्मीदवार तथा गठबंधन की तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है। ऐसे में मौजूदा समीकरणों को अंतिम परिणाम का संकेत मानना जल्दबाजी होगी।

छोटी बढ़त भी बदल सकती है पूरा खेल

चिल्लूपार के पिछले चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि यहां मुकाबला कई बार बेहद करीबी रहा है। 2017 में बसपा के विनय शंकर तिवारी ने भाजपा के राजेश त्रिपाठी को करीब 1.5 प्रतिशत के अंतर से हराया था, जबकि 2022 में भाजपा ने लगभग 9.5 प्रतिशत के अंतर से सीट अपने नाम की।

यानी चिल्लूपार में चुनावी हवा बदलने पर नतीजे भी तेजी से बदल सकते हैं। यही कारण है कि बसपा का नया दांव भाजपा और सपा दोनों के लिए चुनौती माना जा रहा है।

फिलहाल चिल्लूपार में ‘हाता’ की राजनीतिक विरासत, ‘मठ’ का प्रभाव और नए सामाजिक समीकरण आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। बसपा ने अस्मिता चंद को उतारकर मुकाबले को नया रंग दे दिया है। अब देखना होगा कि 2027 के चुनाव में ‘ठाकुर कार्ड’ कितना असरदार साबित होता है और क्या बसपा इस दांव के जरिए चिल्लूपार में दोबारा मजबूत वापसी कर पाती है।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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