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May 26, 2026 10:57 am

ईरान-अमेरिका समझौते में कौन डाल रहा रुकावट? मोजतबा की हामी के बाद भी देरी

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मध्य पूर्व में लंबे समय से जारी तनाव के बीच अब ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई भी अमेरिका के साथ संभावित समझौते और 60 दिनों के सीजफायर के पक्ष में हैं। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच शांति वार्ता अंतिम नतीजे तक नहीं पहुंच पा रही है। सवाल यह है कि जब दोनों पक्ष युद्ध से बाहर निकलना चाहते हैं, तब आखिर रुकावट कहां है?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका और ईरान दोनों ही लगातार आर्थिक और रणनीतिक दबाव में हैं। अमेरिका नहीं चाहता कि मध्य पूर्व में नया बड़ा युद्ध शुरू हो, जबकि ईरान प्रतिबंधों और आर्थिक संकट से जूझ रहा है। इसके बावजूद अविश्वास इतना गहरा है कि हर प्रस्ताव किसी नए विवाद में फंस जाता है।

सबसे बड़ा विवाद होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बना हुआ है। ईरान चाहता है कि अमेरिका पहले समुद्री नाकाबंदी हटाए और तेल निर्यात पर लगी बाधाओं को कम करे। दूसरी तरफ अमेरिका का कहना है कि जब तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं देता, तब तक दबाव कम नहीं किया जाएगा। यही वजह है कि बातचीत आगे बढ़ने के बजाय बार-बार अटक रही है।

परमाणु कार्यक्रम भी दोनों देशों के बीच सबसे संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। अमेरिकी पक्ष चाहता है कि ईरान कई वर्षों तक यूरेनियम संवर्धन सीमित करे और अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में दे। लेकिन ईरान इसे अपनी संप्रभुता का सवाल मान रहा है। तेहरान का दावा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल नागरिक जरूरतों के लिए है और वह किसी दबाव में झुकना नहीं चाहता।

रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि ईरानी सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर पूरी तरह एकमत स्थिति नहीं है। कुछ कट्टरपंथी गुट अमेरिका पर भरोसा करने के खिलाफ हैं। वहीं आर्थिक संकट से परेशान वर्ग चाहता है कि किसी भी तरह प्रतिबंधों में राहत मिले। मोजतबा खामेनेई के समझौते के पक्ष में होने की खबरों ने उम्मीद जरूर बढ़ाई है, लेकिन सत्ता के भीतर मतभेद अभी भी खत्म नहीं हुए हैं।

इजरायल भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। इजरायली नेतृत्व को डर है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच कोई नरम समझौता हो गया, तो ईरान क्षेत्र में और मजबूत हो सकता है। यही कारण है कि इजरायल इस डील को लेकर खुलकर असहजता जता चुका है।

इसके अलावा बातचीत के तरीके को लेकर भी दोनों देशों में बड़ा अंतर है। अमेरिकी नेतृत्व जल्दी नतीजा चाहता है, जबकि ईरान लंबी रणनीतिक बातचीत के जरिए हर शर्त पर विस्तार से चर्चा करना चाहता है। यही कारण है कि कई दौर की बातचीत के बाद भी अंतिम मसौदा तैयार नहीं हो पाया।

हालांकि, हाल की रिपोर्टों में यह संकेत जरूर मिले हैं कि दोनों पक्ष किसी बड़े टकराव से बचना चाहते हैं। तेल बाजार, होर्मुज मार्ग और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव के कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस समझौते को जल्द लागू होते देखना चाहता है। लेकिन जब तक परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भरोसेमंद समाधान नहीं निकलता, तब तक 60 दिनों का सीजफायर सिर्फ कागजों में ही अटका रह सकता है।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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