वॉशिंगटन: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति को लेकर दबाव बढ़ा दिया है। ट्रंप ने शुक्रवार को फेड से ब्याज दरें कम करने की मांग करते हुए चेतावनी दी कि अगर दरों में कटौती नहीं की गई तो अमेरिका उन देशों के साथ व्यापार रोक सकता है, जिनके साथ उसका व्यापार घाटा है। ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका की अगस्त की रोजगार रिपोर्ट उम्मीद से ज्यादा मजबूत रही और बाजार में फेड द्वारा ब्याज दर बढ़ाने की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है।
ट्रंप ने फेड से क्या कहा?
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में फेड से ब्याज दर कम करने की मांग की। उनका तर्क है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था और उसकी क्रेडिट स्थिति मजबूत है, इसलिए देश को दुनिया में सबसे कम ब्याज दरों में से एक मिलनी चाहिए।
ट्रंप ने कहा कि ऊंची ब्याज दरें अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुंचाती हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में व्यापार घाटे वाले देशों के साथ व्यापार रोकने की चेतावनी दी। यह बयान फेड की मौद्रिक नीति पर राष्ट्रपति के बढ़ते सार्वजनिक दबाव को दर्शाता है।
आखिर ट्रंप ब्याज दरें क्यों घटवाना चाहते हैं?
ब्याज दरें कम होने पर आम तौर पर कंपनियों और उपभोक्ताओं के लिए कर्ज लेना सस्ता हो सकता है। इससे निवेश, कारोबार और खर्च को बढ़ावा मिलने की संभावना रहती है। ट्रंप लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि कम ब्याज दरें अमेरिकी अर्थव्यवस्था को और मजबूत कर सकती हैं।
दूसरी ओर, केंद्रीय बैंक ब्याज दर तय करते समय महंगाई और रोजगार जैसे कई आर्थिक संकेतकों को ध्यान में रखता है। अगर महंगाई ज्यादा बनी हुई हो तो बहुत तेजी से दरें घटाना कीमतों पर दबाव बढ़ा सकता है। यही वजह है कि फेड के लिए राष्ट्रपति की मांग के बावजूद फैसला आसान नहीं है।
मजबूत जॉब रिपोर्ट ने बढ़ाई ट्रंप की मुश्किल
ट्रंप की मांग ऐसे समय आई है जब अमेरिका की अगस्त की रोजगार रिपोर्ट उम्मीद से काफी मजबूत रही। अगस्त में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 1.62 लाख नौकरियां जुड़ीं, जबकि अर्थशास्त्रियों का अनुमान इससे काफी कम था। बेरोजगारी दर 4.1% पर बनी रही। मजबूत रोजगार आंकड़ों के बाद बाजार में इस बात की संभावना बढ़ी कि फेड सितंबर की बैठक में दरों में कटौती के बजाय बढ़ोतरी पर विचार कर सकता है।
यही स्थिति ट्रंप और फेड की सोच में अंतर को और स्पष्ट करती है। राष्ट्रपति कम ब्याज दरों को आर्थिक मजबूती और प्रतिस्पर्धा से जोड़ रहे हैं, जबकि फेड को महंगाई और अर्थव्यवस्था की गर्मी को देखते हुए अलग फैसला लेना पड़ सकता है।
फेड के सामने बड़ी चुनौती
फेड की अगली बैठक 15-16 सितंबर को होने वाली है। इससे पहले महंगाई के नए आंकड़े भी सामने आएंगे। फेड के अधिकारी ब्याज दरों पर फैसला लेते समय रोजगार के साथ महंगाई के रुझान को भी अहम मानते हैं।
ऐसे में ट्रंप की सार्वजनिक मांग ने फेड के सामने एक अलग तरह की चुनौती खड़ी कर दी है। अगर फेड दरें नहीं घटाता है तो राष्ट्रपति की आलोचना और बढ़ सकती है। वहीं, अगर आर्थिक आंकड़ों के विपरीत जल्दबाजी में दरों में कटौती होती है तो केंद्रीय बैंक की नीतिगत स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
व्यापार घाटे वाले देशों को लेकर क्या बोले ट्रंप?
ट्रंप ने अपनी चेतावनी को अमेरिका के व्यापार घाटे से जोड़ा है। अमेरिका कई बड़े व्यापारिक साझेदारों के साथ घाटे में कारोबार करता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक चीन के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा सबसे बड़ा है। इसके बाद मेक्सिको और वियतनाम जैसे देश प्रमुख व्यापार घाटे वाले साझेदारों में शामिल हैं।
ट्रंप का कहना है कि अमेरिका को ऐसे देशों के साथ व्यापार संबंधों में नुकसान नहीं उठाना चाहिए। उन्होंने व्यापार रोकने की धमकी को टैरिफ से भी अधिक प्रभावी विकल्प के तौर पर पेश किया है। हालांकि, इस तरह का कदम लागू होने पर अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं पर भी असर पड़ सकता है, क्योंकि अमेरिका कई देशों से बड़े पैमाने पर सामान और कच्चा माल आयात करता है।
अमेरिका-भारत व्यापार पर भी पड़ सकता है असर?
ट्रंप की टिप्पणी व्यापक रूप से उन देशों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके साथ अमेरिका का व्यापार घाटा है। भारत भी अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों में एक महत्वपूर्ण साझेदार है और दोनों देशों के बीच वस्तुओं के व्यापार में अमेरिका का घाटा रहा है। हालांकि, ट्रंप की ताजा टिप्पणी को भारत के खिलाफ किसी विशिष्ट नए फैसले के रूप में नहीं देखा जा सकता। फिलहाल यह एक व्यापक चेतावनी है, जिसे उन्होंने व्यापार घाटे वाले देशों के संदर्भ में दिया है।
क्या राष्ट्रपति सीधे फेड की ब्याज दर तय कर सकते हैं?
अमेरिकी फेडरल रिजर्व को मौद्रिक नीति के फैसलों में स्वतंत्रता हासिल है। राष्ट्रपति सार्वजनिक रूप से ब्याज दर कम करने की मांग कर सकते हैं, लेकिन दरों का फैसला फेड के नीति-निर्माता करते हैं।
यही वजह है कि ट्रंप की ताजा टिप्पणी को फेड की स्वतंत्रता को लेकर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राष्ट्रपति का दबाव और केंद्रीय बैंक के आर्थिक आकलन के बीच अंतर आने वाले दिनों में अमेरिकी आर्थिक नीति की बड़ी बहस बन सकता है।
अगर व्यापार रोकने की बात आगे बढ़ी तो क्या होगा?
अमेरिका अगर वास्तव में बड़े व्यापारिक साझेदारों के साथ व्यापार रोकने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो इसका असर केवल दूसरे देशों पर नहीं बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। आयात में बड़ी बाधा आने से सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है और कुछ वस्तुओं की लागत बढ़ सकती है। इससे महंगाई पर भी दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
इसके अलावा ऐसे कदम से अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों में तनाव बढ़ सकता है। इसलिए ट्रंप की चेतावनी को फिलहाल एक कड़े राजनीतिक और आर्थिक बयान के रूप में देखा जा रहा है; इसे तत्काल लागू हो चुका व्यापार प्रतिबंध नहीं माना जाना चाहिए।
अब सबकी नजर सितंबर की फेड बैठक पर
ट्रंप की मांग और मजबूत रोजगार आंकड़ों ने सितंबर की फेड बैठक को और महत्वपूर्ण बना दिया है। एक तरफ राष्ट्रपति कम ब्याज दरों की मांग कर रहे हैं, वहीं मजबूत रोजगार और महंगाई से जुड़े आंकड़े फेड को सख्त रुख अपनाने की वजह दे सकते हैं।
अब आने वाले महंगाई आंकड़े और फेड अधिकारियों के बयान यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि सितंबर में ब्याज दरों को लेकर क्या फैसला होता है। फिलहाल इतना साफ है कि ट्रंप बनाम फेड की ब्याज दर वाली जंग एक बार फिर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वैश्विक बाजारों के लिए बड़ी खबर बन गई है।








