मेडिकल डिवाइस की कीमतों और मरीजों पर पड़ने वाले इलाज के खर्च को लेकर Trade Margin Rationalisation (TMR) एक बार फिर चर्चा में है। इसका उद्देश्य सप्लाई चेन में अलग-अलग स्तरों पर लिए जाने वाले व्यापारिक मार्जिन को तर्कसंगत बनाना और जरूरत पड़ने पर अत्यधिक कीमतों पर लगाम लगाना है। भारत में National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) पहले भी कुछ जरूरी मेडिकल डिवाइस पर TMR लागू कर चुकी है।
क्या है TMR?
TMR यानी Trade Margin Rationalisation ऐसी व्यवस्था है, जिसमें निर्माता से लेकर डिस्ट्रीब्यूटर और रिटेल स्तर तक उत्पाद पर लगने वाले व्यापारिक मार्जिन को नियंत्रित या तर्कसंगत किया जाता है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सप्लाई चेन में अत्यधिक मार्जिन के कारण मरीजों को मेडिकल डिवाइस के लिए असामान्य रूप से ज्यादा कीमत न चुकानी पड़े।
कोरोना महामारी के दौरान NPPA ने ऑक्सीजन कंसंट्रेटर के अलावा पल्स ऑक्सीमीटर, ब्लड प्रेशर मॉनिटर, नेब्युलाइजर, डिजिटल थर्मामीटर और ग्लूकोमीटर जैसे पांच मेडिकल डिवाइस के ट्रेड मार्जिन को 70% तक सीमित किया था।
TMR से पहले क्या हुआ था?
मेडिकल डिवाइस के मामले में सरकार पहले से ही अलग-अलग कीमत नियंत्रण व्यवस्थाओं का इस्तेमाल करती रही है। कुछ अनुसूचित मेडिकल डिवाइस के लिए NPPA सीलिंग प्राइस तय करती है, जबकि गैर-अनुसूचित डिवाइस के मामले में भी कीमतों की निगरानी की जाती है।
मार्च 2026 में सरकार ने राज्यसभा में बताया कि गैर-अनुसूचित दवाओं और मेडिकल डिवाइस का MRP पिछले 12 महीनों में 10% से ज्यादा बढ़ाया नहीं जा सकता। NPPA कीमतों की निगरानी करती है और ओवरचार्जिंग की शिकायत मिलने पर कार्रवाई कर सकती है।
किन मेडिकल डिवाइस पर पहले लगा TMR?
TMR व्यवस्था के तहत 2021 में पांच प्रमुख मेडिकल डिवाइस को शामिल किया गया था—पल्स ऑक्सीमीटर, ब्लड प्रेशर मॉनिटर, नेब्युलाइजर, डिजिटल थर्मामीटर और ग्लूकोमीटर। NPPA के रिकॉर्ड में इन डिवाइस के लिए TMR अधिसूचना और बाद में इसकी अवधि बढ़ाने के फैसले दर्ज हैं।
ऑक्सीजन कंसंट्रेटर के लिए भी अलग से ट्रेड मार्जिन कैप लगाया गया था। सरकारी वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद 252 में से 70 उत्पादों की कीमतों में कमी देखी गई और कुछ मामलों में खुदरा कीमतों में 54% तक की गिरावट दर्ज की गई।
मरीजों को कैसे मिल सकती है राहत?
अगर किसी मेडिकल डिवाइस की कीमत में सप्लाई चेन के अलग-अलग स्तरों पर बहुत ज्यादा मार्जिन जुड़ रहा है, तो व्यापारिक मार्जिन को सीमित करने से अंतिम कीमत कम होने की संभावना बनती है। इसका सीधा असर मरीज या ग्राहक द्वारा चुकाई जाने वाली राशि पर पड़ सकता है।
हालांकि, किसी नए TMR नियम का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-कौन से डिवाइस इसके दायरे में आते हैं, मार्जिन की सीमा कितनी तय होती है और नियमों को किस तरह लागू किया जाता है।
मेडिकल डिवाइस की कीमतों पर सरकार की नजर
मार्च 2026 में सरकार ने बताया था कि NPPA अनुसूचित और गैर-अनुसूचित मेडिकल डिवाइस दोनों की कीमतों पर निगरानी रखती है। कीमतों से संबंधित शिकायतें राज्य औषधि नियंत्रकों, Price Monitoring and Resource Units, बाजार से लिए गए नमूनों और अन्य शिकायत निवारण माध्यमों से प्राप्त हो सकती हैं।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया था कि उस समय ‘One Nation, One Price’ या सभी जरूरी मेडिकल डिवाइस के लिए देशव्यापी एक समान प्राइस कैप का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं था।
मुनाफे और मरीजों के खर्च के बीच संतुलन की चुनौती
मेडिकल डिवाइस उद्योग में कीमतों को नियंत्रित करने के साथ-साथ कंपनियों के लिए शोध, उत्पादन, आयात, वितरण और तकनीकी विकास की लागत को भी ध्यान में रखना पड़ता है। सरकार की मेडिकल डिवाइस संबंधी नीतियों में घरेलू निर्माण और इनोवेशन को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है। 2026 में सरकार ने घरेलू मेडिकल डिवाइस उत्पादन और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए योजनाओं के तहत सहायता का प्रावधान किया है।
अभी क्या समझना जरूरी है?
TMR को मेडिकल डिवाइस की कीमतों को तर्कसंगत बनाने के एक नियामकीय माध्यम के रूप में देखा जा सकता है। पहले लागू किए गए TMR से कुछ उपकरणों की कीमतों में कमी के सरकारी आंकड़े सामने आए हैं, लेकिन हर मेडिकल डिवाइस पर इसका असर एक जैसा नहीं होगा।
इसलिए यदि भविष्य में TMR का दायरा और बढ़ाया जाता है, तो मरीजों के लिए राहत इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार किन उपकरणों को शामिल करती है और उनके लिए किस तरह की मार्जिन सीमा निर्धारित करती है।








