वॉशिंगटन। ईरान के साथ जारी युद्ध के बीच अमेरिका की सैन्य तैनाती में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार ने मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य जरूरतों को प्राथमिकता देते हुए प्रशांत क्षेत्र से भी महत्वपूर्ण सैन्य संसाधनों को स्थानांतरित किया है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी नौसेना का USS George Washington प्रशांत क्षेत्र से मध्य पूर्व की ओर बढ़ रहा है, ताकि लंबे समय से तैनात USS Abraham Lincoln को राहत दी जा सके।
इस बदलाव का सीधा असर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी पर पड़ सकता है। रिपोर्टों के अनुसार, जॉर्ज वॉशिंगटन के रवाना होने के बाद पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में कुछ समय के लिए अमेरिकी विमानवाहक पोत की मौजूदगी नहीं रह सकती। ऐसे में चीन के लिए क्षेत्र में अपनी सैन्य और रणनीतिक गतिविधियां बढ़ाने की संभावनाएं बढ़ गई हैं।
ईरान युद्ध ने बढ़ाया अमेरिकी सैन्य दबाव
ईरान के साथ लंबे समय से चल रहे संघर्ष ने अमेरिकी सैन्य संसाधनों पर दबाव बढ़ाया है। USS Abraham Lincoln लंबे समय से मध्य पूर्व में तैनात है और उसकी तैनाती 260 दिनों से अधिक हो चुकी है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, जहाज को अब राहत देने की जरूरत है और इसी क्रम में George Washington को क्षेत्र की ओर भेजा गया है।
अमेरिका ईरान पर सैन्य दबाव के साथ-साथ आर्थिक और नौसैनिक दबाव की रणनीति भी अपना रहा है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा है कि अमेरिकी नौसेना ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी को लंबे समय तक बनाए रखने में सक्षम है।
चीन के लिए क्यों बन रहा है मौका?
अमेरिका का ध्यान अगर मध्य पूर्व में लंबे समय तक केंद्रित रहता है, तो चीन को इंडो-पैसिफिक में अपनी गतिविधियों के लिए अतिरिक्त रणनीतिक अवसर मिल सकता है। हालिया विश्लेषणों में भी कहा गया है कि ईरान युद्ध के कारण अमेरिका की कुछ सैन्य क्षमताएं इंडो-पैसिफिक से मध्य पूर्व की ओर स्थानांतरित हुई हैं।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि चीन को सीधे तौर पर कोई सैन्य लाभ मिल गया है या अमेरिका ने एशिया से अपनी प्रतिबद्धता खत्म कर दी है। यह फिलहाल संसाधनों और प्राथमिकताओं में बदलाव है। अमेरिकी सहयोगी देश भी क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अपनी तैयारियां बढ़ा रहे हैं।
पश्चिमी प्रशांत पर बढ़ी नजर
चीन लंबे समय से पश्चिमी प्रशांत और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ा रहा है। ऐसे में अमेरिकी विमानवाहक पोत की अस्थायी अनुपस्थिति को रणनीतिक नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालिया रिपोर्टों में चीन की क्षेत्रीय गतिविधियों और जापान, फिलीपींस तथा अन्य देशों के साथ बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी उल्लेख किया गया है। यही वजह है कि अमेरिका की सैन्य तैनाती में छोटे बदलाव को भी इंडो-पैसिफिक की सुरक्षा के संदर्भ में करीब से देखा जा रहा है।
ट्रंप की रणनीति में आया बदलाव?
ट्रंप प्रशासन ने हाल के दिनों में ईरान को लेकर अपनी रणनीति में भी बदलाव के संकेत दिए हैं। ट्रंप ने एक हालिया इंटरव्यू में कहा कि अमेरिका फिलहाल ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को बढ़ाने के बजाय आर्थिक दबाव पर अधिक ध्यान दे रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका के पास सैन्य विकल्प मौजूद हैं।
इसका मतलब यह है कि वॉशिंगटन एक तरफ ईरान पर दबाव बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ अपने सैन्य संसाधनों को लंबे संघर्ष के लिए व्यवस्थित करने की कोशिश कर रहा है।
क्या चीन सचमुच ‘गदगद’ है?
चीन के लिए यह स्थिति रणनीतिक अवसर जरूर पैदा कर सकती है, लेकिन इसे सीधे तौर पर चीन की जीत कहना जल्दबाजी होगी। ईरान युद्ध के कारण अमेरिकी सैन्य संसाधनों पर दबाव बढ़ा है, मगर अमेरिका के सहयोगी देश भी इंडो-पैसिफिक में सक्रिय हैं और अपनी रक्षा तैयारियां मजबूत कर रहे हैं।
इसलिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य प्रतिबद्धता कितने समय तक जारी रहती है और अमेरिका प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी को कितनी जल्दी सामान्य करता है। आने वाले महीनों में यही घटनाक्रम अमेरिका-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा की दिशा पर बड़ा असर डाल सकता है।








