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June 24, 2026 7:47 pm

बदल रही है परवरिश की तस्वीर: कभी जिम्मेदारी निभाते थे बच्चे, अब बढ़ा माता-पिता का नियंत्रण

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भारतीय परिवारों में बच्चों की परवरिश और उनकी भूमिका को लेकर बड़ा सामाजिक बदलाव देखने को मिल रहा है। एक समय था जब बच्चे कम उम्र से ही परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटाने लगते थे, लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। नई पीढ़ी के बच्चों पर माता-पिता का नियंत्रण बढ़ा है, जबकि परिवार और समाज में उनकी जिम्मेदारियां पहले की तुलना में कम होती जा रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती जीवनशैली, शिक्षा का बढ़ता महत्व, तकनीक का प्रभाव और छोटे होते परिवार इस बदलाव के प्रमुख कारण हैं।

जिम्मेदारियों से नियंत्रित माहौल तक

पहले के समय में बच्चों को घर के कामों में सहयोग करना, छोटे भाई-बहनों की देखभाल करना और परिवार की आर्थिक या सामाजिक जिम्मेदारियों को समझना सिखाया जाता था। ग्रामीण क्षेत्रों में तो बच्चे खेती-बाड़ी और पारिवारिक व्यवसाय में भी योगदान देते थे।

लेकिन आज के शहरी और आधुनिक परिवारों में बच्चों की दिनचर्या मुख्य रूप से स्कूल, ट्यूशन, कोचिंग और डिजिटल गतिविधियों तक सीमित होती जा रही है। उनकी सुरक्षा, पढ़ाई और भविष्य को लेकर माता-पिता की चिंता इतनी बढ़ गई है कि कई मामलों में बच्चों को निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी कम मिल रही है।

पढ़ाई ही सफलता का एकमात्र रास्ता नहीं

समाजशास्त्रियों के अनुसार, पहले अधिकांश परिवार यह मानते थे कि अच्छी शिक्षा ही सफलता का सबसे बड़ा आधार है। हालांकि अब यह सोच बदल रही है। परिवारों का एक बड़ा वर्ग मानने लगा है कि सिर्फ अकादमिक उपलब्धियां ही सफलता तय नहीं करतीं।

आजकल माता-पिता बच्चों के लिए खेल, संगीत, कला, तकनीकी कौशल, उद्यमिता और व्यक्तित्व विकास जैसे क्षेत्रों को भी उतना ही महत्व देने लगे हैं। यही कारण है कि केवल पढ़ाई पर जोर देने वाले परिवारों की संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है।

तकनीक ने बदली परवरिश

स्मार्टफोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने बच्चों की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। जहां पहले बच्चे अधिक समय परिवार और समुदाय के साथ बिताते थे, वहीं अब उनका बड़ा समय डिजिटल प्लेटफॉर्म पर गुजरता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इससे बच्चों को नई जानकारी और अवसर तो मिले हैं, लेकिन साथ ही माता-पिता की निगरानी और नियंत्रण भी बढ़ा है। कई परिवार बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों, दोस्ती और समय प्रबंधन पर लगातार नजर रखते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर भी चर्चा

आधुनिक परवरिश में मानसिक स्वास्थ्य भी एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक नियंत्रण बच्चों में तनाव, आत्मविश्वास की कमी और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि कई माता-पिता का तर्क है कि प्रतिस्पर्धी माहौल में बच्चों को सही दिशा देना और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है।

संतुलन की जरूरत

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को पूरी स्वतंत्रता देना भी उचित नहीं है और अत्यधिक नियंत्रण भी नुकसानदायक हो सकता है। परवरिश का सबसे प्रभावी तरीका वही माना जाता है, जिसमें जिम्मेदारी और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाया जाए।

बच्चों को निर्णय लेने, गलतियों से सीखने और सामाजिक जिम्मेदारियों को समझने का अवसर देना उनके व्यक्तित्व विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

समाज में बदलती सोच

परिवारों की बदलती प्राथमिकताएं यह दर्शाती हैं कि आज की पीढ़ी सफलता को केवल अंकों और डिग्रियों से नहीं माप रही। अब रचनात्मकता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता, संचार कौशल और आत्मनिर्भरता जैसे गुण भी उतने ही महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

आगे क्या?

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में परवरिश के तरीके और भी बदलेंगे। तकनीक, शिक्षा और सामाजिक संरचना में हो रहे बदलाव बच्चों की भूमिका और परिवारों की सोच को लगातार प्रभावित करते रहेंगे।

कुल मिलाकर, भारतीय परिवारों में परवरिश की तस्वीर तेजी से बदल रही है। जहां पहले बच्चों को जिम्मेदारियों के जरिए जीवन के पाठ सिखाए जाते थे, वहीं अब उनकी सुरक्षा, शिक्षा और भविष्य को लेकर माता-पिता की भूमिका पहले से कहीं अधिक सक्रिय और नियंत्रक हो गई है।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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