डेस्क। वर्तमान पीढ़ी शायद भारत के इतिहास की सबसे सौभाग्यशाली और सबसे अधिक परिवर्तन देखने वाली पीढ़ी है। हमने दो युगों को अपनी आँखों से जीया है। एक वो युग जहाँ चिट्ठी का इंतजार महीनों तक होता था, जहाँ गाँव में एक ही ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविजन होता था और पूरा गाँव उसे देखने उमड़ पड़ता था, जहाँ टेलीफोन करने के लिए शहर के एसटीडी बूथ तक जाना पड़ता था और दूसरा वो युग जहाँ पूरी दुनिया हमारी हथेली में है, जहाँ हम बटन दबाते ही अमेरिका में बैठे अपने बेटे से वीडियो कॉल पर बात कर लेते हैं। यह परिवर्तन केवल तकनीक का परिवर्तन नहीं है, यह सोच का, समाज का, रिश्तों का और जीवन जीने के तरीके का परिवर्तन है। आज का डिजिटल युग एक क्रांति है, एक ऐसी क्रांति जिसने हमारे जीवन के हर पहलू को बदलकर रख दिया है।
याद कीजिये आज से तीस साल पहले का भारत। जब हम पोस्टमैन का इंतजार करते थे। एक चिट्ठी लिखी जाती थी, फिर वह पन्द्रह दिन में अपनी मंजिल तक पहुँचती थी, फिर उसका जवाब आता था। उस चिट्ठी में भावनाएँ होती थीं, इंतजार होता था, अपनापन होता था। आज व्हाट्सएप पर संदेश एक सेकंड में पहुँच जाता है, लेकिन उसमें वह भावना कहाँ है। पहले गाँव में किसी के घर शादी का निमंत्रण देना होता था तो लोग पैदल-पैदल, घर-घर जाकर पीले चावल देते थे। उसमें आत्मीयता थी। आज एक ही मैसेज से हजार लोगों को ई-कार्ड भेज दिया जाता है। काम तो आसान हो गया, लेकिन रिश्तों की गर्माहट कम हो गई। यह डिजिटल युग का सबसे बड़ा सच है कि इसने दूरी को तो खत्म कर दिया, लेकिन नजदीकियों में भी एक अजीब सी दूरी पैदा कर दी है। आज एक ही घर में चार लोग हैं और चारों अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त हैं। हम हजारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति से जुड़े हैं, लेकिन पास बैठे अपने पिता से बात करने का समय हमारे पास नहीं है।
लेकिन इस परिवर्तन के सकारात्मक पहलू को भी हमें देखना होगा और वह बहुत बड़ा है। डिजिटल युग ने लोकतंत्र को सच्चे अर्थों में लोकतंत्र बनाया है। आज एक गरीब से गरीब आदमी भी अपने मोबाइल से अपनी बात प्रधानमंत्री तक पहुँचा सकता है। आज एक गाँव के किसान को अपनी फसल का भाव पता करने के लिए मंडी नहीं जाना पड़ता, वह अपने खेत में बैठे-बैठे मोबाइल पर भाव देख लेता है। आज हमारी बेटियाँ, जो पहले घर की चारदीवारी में कैद रहती थीं, वह आज ऑनलाइन पढ़ाई करके डॉक्टर, इंजीनियर बन रही हैं। कोरोना काल में जब सारे स्कूल बंद हो गये थे, तब इसी डिजिटल तकनीक ने हमारे बच्चों की पढ़ाई को बचाया। आज एक मजदूर भी अपने मोबाइल से अपना पैसा अपनी माँ के खाते में एक सेकंड में भेज देता है, जो पहले महीनों का काम था। सरकार की योजनाओं का पैसा अब सीधा लाभार्थी के खाते में जाता है, बिचौलियों की दुकान बंद हो गई। यह बहुत बड़ी क्रांति है।
वर्तमान पीढ़ी ने शिक्षा में जो बदलाव देखा है, वह अभूतपूर्व है। हमने स्लेट और खड़िया से पढ़ना शुरू किया था, जहाँ एक ही किताब को पूरा साल घोटा जाता था। आज हमारे बच्चों के पास पूरी लाइब्रेरी मोबाइल में है। वे गूगल पर कुछ भी सर्च कर सकते हैं, यूट्यूब पर दुनिया के सबसे बड़े शिक्षक का लेक्चर सुन सकते हैं। लेकिन यहाँ भी एक चुनौती है। पहले जानकारी कम थी, लेकिन ज्ञान गहरा था। आज जानकारी बहुत ज्यादा है, लेकिन ज्ञान उथला होता जा रहा है। बच्चे गूगल पर उत्तर तो तुरंत ढूंढ लेते हैं, लेकिन उसे याद रखने, उस पर चिंतन करने की आदत खत्म होती जा रही है। पहले हम पहाड़े याद करते थे, आज कैलकुलेटर है। सुविधा बढ़ी है, लेकिन स्मृति और मेहनत कम हुई है। इसलिए आज के शिक्षक और अभिभावक की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है कि वह बच्चों को तकनीक का गुलाम नहीं, बल्कि उसका मालिक बनना सिखाये।
इस डिजिटल युग ने हमारे गाँवों को भी पूरी तरह बदल दिया है। आज गाँव का युवा भी इंस्टाग्राम पर रील बना रहा है, यूट्यूब पर अपना चैनल चला रहा है और लाखों कमा रहा है। यह नया रोजगार है, नया अवसर है। लेकिन इसी के साथ अश्लीलता, फूहड़ता और गलत संस्कारों का भी प्रचार बहुत तेजी से हो रहा है। हम व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर, फेसबुक पर लिखकर लोगों को जागरूक कर सकते हैं। तकनीक तो एक औजार है, वह अच्छा भी है और बुरा भी। वह चाकू की तरह है, उससे सब्जी भी काटी जा सकती है और किसी को चोट भी पहुँचाई जा सकती है। यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसका उपयोग कैसे करते हैं।
अंत में मैं यही कहना चाहता हूँ कि परिवर्तन को रोका नहीं जा सकता। जो पीढ़ी परिवर्तन को स्वीकार नहीं करती, वह पिछड़ जाती है। हमारी पीढ़ी ने बैलगाड़ी से लेकर हवाई जहाज तक, चिट्ठी से लेकर वीडियो कॉल तक का सफर देखा है। यह हमारी ताकत है। हमें अपने अनुभव और नई तकनीक का संगम करना होगा। हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि मोबाइल तुम्हारा नौकर है, मालिक नहीं। दिन में दो घंटे मोबाइल बंद रखो, अपने परिवार के साथ बैठो, खेत में जाओ, बुजुर्गों से बात करो। तकनीक को अपनाओ, लेकिन अपनी संस्कृति, अपनी सादगी और अपने संस्कारों को मत छोड़ो। डिजिटल युग में भी यदि हमने अपनी जड़ों को पकड़े रखा, तो हम विश्व में सबसे आगे रहेंगे, नहीं तो हम तकनीक के होते हुए भी अकेले और खोखले रह जायेंगे। यही इस डिजिटल युग का सबसे बड़ा संदेश है।
(ये लेखक के नीजि विचार है)
रामराज मीना शिक्षक, सामाजिक चिंतक एवं विचारक








