बिहार में नई सरकार के गठन के बाद मंत्रिमंडल में विभागों का औपचारिक बंटवारा कर दिया गया है। इस पोर्टफोलियो आवंटन के साथ ही राज्य की प्रशासनिक तस्वीर साफ हो गई है और यह भी स्पष्ट हो गया है कि किन नेताओं के पास किन-किन अहम विभागों की जिम्मेदारी रहेगी।
सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री के पास सबसे ज्यादा मंत्रालयों का भार रखा गया है। सीएम ने गृह, सामान्य प्रशासन, कैबिनेट सचिवालय, राजस्व एवं भूमि सुधार, स्वास्थ्य, कृषि, पथ निर्माण, नगर विकास, उद्योग, आपदा प्रबंधन सहित कई प्रमुख विभाग अपने पास रखे हैं। माना जा रहा है कि सरकार की सबसे महत्वपूर्ण नीतियों और फैसलों पर सीएम कार्यालय का सीधा नियंत्रण रहेगा।
वहीं, उपमुख्यमंत्री स्तर पर भी जिम्मेदारियों का संतुलन किया गया है। एक डिप्टी CM को शिक्षा, ग्रामीण विकास, जल संसाधन, संसदीय कार्य और सूचना एवं जनसंपर्क जैसे अहम विभाग दिए गए हैं, जबकि दूसरे डिप्टी CM को वित्त, ऊर्जा, समाज कल्याण और वाणिज्य कर जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह पोर्टफोलियो बंटवारा सत्ता के केंद्रीकरण और सहयोगी दलों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश को दर्शाता है। सीएम के पास अधिक विभाग होने से प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत दिखता है, जबकि डिप्टी CM को दिए गए विभाग सरकार के संचालन में संतुलन बनाए रखने का काम करेंगे।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का विभागीय वितरण सरकार की कार्यशैली पर भी असर डालेगा। एक ओर जहां तेज निर्णय लेने की संभावना बढ़ेगी, वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री पर कार्यभार का दबाव भी काफी ज्यादा रहेगा। खासकर विकास, कानून-व्यवस्था और वित्त जैसे अहम क्षेत्रों में सरकार की प्राथमिकताएं आने वाले समय में स्पष्ट होंगी।
इस बीच राजनीतिक हलकों में इस बात की भी चर्चा है कि मंत्रालयों का यह बंटवारा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। इससे गठबंधन की एकजुटता और सत्ता संतुलन को बनाए रखने की कोशिश की गई है।
कुल मिलाकर, बिहार कैबिनेट का यह पोर्टफोलियो बंटवारा आने वाले समय में राज्य की राजनीति और प्रशासन दोनों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि नई सरकार अपने इन विभागों के जरिए कितना प्रभावी शासन दे पाती है।







