कैंसर के इलाज में एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। अमेरिकी फार्मा कंपनियों मॉडर्ना और मर्क ने अपनी व्यक्तिगत (पर्सनलाइज्ड) mRNA कैंसर वैक्सीन के फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल के नतीजे जारी किए हैं। इस वैक्सीन ने स्किन कैंसर (मेलानोमा) के मरीजों में सर्जरी के बाद बीमारी के दोबारा लौटने और शरीर के अन्य हिस्सों में फैलने के खतरे को काफी कम कर दिया है। विशेषज्ञों ने इसे कैंसर थेरेपी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम बताया है।
क्या है नई थेरेपी?
यह थेरेपी मॉडर्ना की व्यक्तिगत mRNA वैक्सीन ‘इंटिस्मेरन’ (intismeran) और मर्क की इम्यूनोथेरेपी दवा ‘कीट्रुडा’ (Keytruda/pembrolizumab) के कॉम्बिनेशन पर आधारित है। वैक्सीन को मरीज के ट्यूमर के आधार पर बनाया जाता है। सर्जरी के बाद ट्यूमर का सैंपल लेकर उसके डीएनए का विश्लेषण किया जाता है। इसमें मौजूद खास म्यूटेशन (नियोएंटीजन) की पहचान कर mRNA वैक्सीन तैयार की जाती है, जो इम्यून सिस्टम को सिखाती है कि कैंसर कोशिकाओं पर कैसे हमला करना है।
यह प्रक्रिया लगभग छह सप्ताह में पूरी हो जाती है। वैक्सीन को कीट्रुडा के साथ दिया जाता है, जिससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और मजबूत होती है।
ट्रायल के नतीजे क्या कहते हैं?
INTerpath-001 नाम के फेज-3 ट्रायल में 1,137 हाई-रिस्क मेलानोमा मरीजों को शामिल किया गया था। इन सभी मरीजों की सर्जरी हो चुकी थी और उनमें कैंसर दोबारा लौटने का खतरा ज्यादा था।
नतीजों के अनुसार:
- वैक्सीन + कीट्रुडा लेने वाले मरीजों में सिर्फ कीट्रुडा लेने वालों की तुलना में कैंसर के दोबारा लौटने का खतरा काफी कम रहा।
- बीमारी के दूर के अंगों में फैलने (Distant Metastasis) का जोखिम भी घटा।
- पहले के फेज-2 ट्रायल के पांच साल के फॉलो-अप में पुनरावृत्ति या मौत के जोखिम में लगभग 49 प्रतिशत तक कमी देखी गई थी।
कंपनी का कहना है कि यह किसी भी व्यक्तिगत कैंसर वैक्सीन का पहला सफल फेज-3 ट्रायल है।
कैसे काम करती है यह वैक्सीन?
पारंपरिक वैक्सीन की तरह यह संक्रमण से बचाव नहीं करती, बल्कि इलाज के बाद बची हुई कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने में मदद करती है। व्यक्तिगत होने के कारण यह हर मरीज के ट्यूमर के अनुरूप काम करती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तरीका आगे चलकर फेफड़े, ब्लैडर, किडनी और अग्नाशय जैसे अन्य कैंसर में भी आजमाया जा सकता है।
आगे की राह
अभी पूरे विस्तृत नतीजे पीयर-रिव्यू जर्नल में प्रकाशित होने बाकी हैं। नियामक मंजूरी के बाद ही यह थेरेपी आम मरीजों के लिए उपलब्ध हो सकेगी। भारत में मेलानोमा अपेक्षाकृत कम होता है, लेकिन इस तकनीक का अन्य कैंसर में विस्तार होने पर देश के मरीजों को भी फायदा मिल सकता है।
डॉक्टर्स का कहना है कि यह सफलता कैंसर के खिलाफ लड़ाई में नई दिशा खोलती है। व्यक्तिगत इलाज की ओर बढ़ता यह कदम भविष्य में कई मरीजों की जिंदगी बचा सकता है। हालांकि, अंतिम मंजूरी और लंबी अवधि के आंकड़ों का इंतजार अभी बाकी है।








