नई दिल्ली। एस्सेल ग्रुप और जी मीडिया ग्रुप के संस्थापक-चेयरमैन सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत दिवालियापन मामले में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) ने मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाया। NCLT की स्पेशल बेंच ने 25 अगस्त के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें सुभाष चंद्रा को करीब 22,006 करोड़ रुपये के दावों के बदले सिर्फ लगभग 6.25 से 6.5 करोड़ रुपये चुकाने की अनुमति दी गई थी। साथ ही ट्रिब्यूनल ने साफ आदेश दिया कि वे गारंटर के तौर पर अपनी किसी भी संपत्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ट्रांसफर या बेच नहीं सकते।
मामले की सुनवाई कर रहे तीन सदस्यों के बीच मतभेद सामने आने के बाद इसे पांच सदस्यीय स्पेशल बेंच के सामने रखा गया। स्पेशल बेंच ने मंगलवार को सुनवाई शुरू करते हुए कहा कि पहले के आदेशों में स्पष्ट बहुमत नहीं बन पाया था, इसलिए उन्हें लागू नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर पुराने आदेश पर स्टे लगा दिया गया। NCLT ने मामले से जुड़े सभी पक्षों को नोटिस भी जारी कर दिया है।
क्या था पुराना विवादित आदेश?
पिछले आदेश के तहत NCLT ने सुभाष चंद्रा के खिलाफ स्वीकार किए गए करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के दावों के निपटारे के लिए सिर्फ 6.25 करोड़ रुपये लेनदारों को और 25 लाख रुपये प्रक्रिया खर्च के रूप में चुकाने की योजना को मंजूरी दी थी। कुल मिलाकर यह राशि लगभग 6.5 करोड़ रुपये थी। इससे लेनदारों को महज 0.03 प्रतिशत के आसपास वसूली हो रही थी, यानी करीब 99.97 प्रतिशत का हेयरकट।
यह मामला व्यक्तिगत गारंटर के रूप में सुभाष चंद्रा के खिलाफ चलाया गया था। वे खुद प्रत्यक्ष रूप से इतना बड़ा कर्ज नहीं लिए थे, बल्कि एस्सेल ग्रुप की विभिन्न कंपनियों के लोन के लिए व्यक्तिगत गारंटर बने थे। योजना को 80 प्रतिशत से अधिक लेनदारों का समर्थन मिला था, लेकिन एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, एचडीएफसी बैंक, केनरा बैंक और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया जैसे प्रमुख संस्थानों ने इसका विरोध किया था। कई बैंकों ने इसे चुनौती देने की तैयारी भी बताई थी।
क्यों लगाई गई रोक?
NCLT की स्पेशल बेंच ने पाया कि पहले की पीठ में सदस्यों के बीच मतभेद थे और कोई स्पष्ट बहुमत नहीं बन पाया था। इसलिए पुराने आदेश को लागू करना उचित नहीं था। बेंच ने सुभाष चंद्रा को निर्देश दिया कि वे अपनी किसी भी प्रॉपर्टी को बेचने, ट्रांसफर करने या किसी अन्य तरीके से हस्तांतरित करने से बचें। यह प्रतिबंध तब तक लागू रहेगा जब तक मामला आगे नहीं निपटाया जाता।
इस फैसले के बाद सुभाष चंद्रा की तरफ से पहले दिए गए स्पष्टीकरण पर भी चर्चा हो रही है। उन्होंने कहा था कि उन्होंने खुद किसी लेनदार से पैसा नहीं उधार लिया। कंपनियों ने कुल बकाए का बड़ा हिस्सा चुका दिया है और विरोधी लेनदारों का दावा असल में 22,000 करोड़ नहीं, बल्कि करीब 3,992 करोड़ रुपये का है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 2022 में शुरू हुआ था जब इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस ने सुभाष चंद्रा के खिलाफ व्यक्तिगत दिवालियापन की कार्रवाई शुरू की। बाद में कई अन्य लेनदार भी शामिल हो गए। सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के कारण प्रक्रिया कुछ समय के लिए रुकी रही। 2025 में दो सदस्यीय पीठ का फैसला बंटा हुआ था। इसके बाद तीसरे सदस्य को शामिल किया गया, जिन्होंने अगस्त 2026 में योजना को मंजूरी दी। अब मतभेदों के कारण पांच सदस्यीय स्पेशल बेंच मामले की सुनवाई कर रही है।
आगे क्या?
NCLT के इस आदेश के बाद मामला फिर से चर्चा में आ गया है। विरोधी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए यह राहत की खबर है, क्योंकि अब पुराना कम भुगतान वाला प्लान लागू नहीं हो सकेगा। वहीं, सुभाष चंद्रा की तरफ से आगे क्या कदम उठाए जाते हैं, यह देखना बाकी है। ट्रिब्यूनल ने सभी पक्षों को नोटिस जारी कर आगे की सुनवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
यह मामला व्यक्तिगत गारंटर से जुड़े दिवालियापन मामलों में बड़े हेयरकट और लेनदारों के अधिकारों को लेकर चल रही बहस को फिर से चर्चा में ला दिया है। अब देखना होगा कि स्पेशल बेंच अंतिम रूप से क्या फैसला सुनाती है और क्या सुभाष चंद्रा को कोई राहत मिलती है या लेनदारों को बेहतर वसूली का रास्ता खुलता है।








