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October 24, 2026 8:48 pm

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करवा चौथ 2026: पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए बड़ी राहत, इस साल नहीं है किसी भी प्रकार की धार्मिक रोक

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विवाह के पश्चात अपना पहला करवा चौथ मनाने की तैयारी कर रही महिलाओं के लिए एक बहुत ही राहत भरी खबर सामने आई है। इस वर्ष पहली बार करवा चौथ का व्रत रखने पर किसी भी प्रकार की धार्मिक पाबंदी या रोक नहीं है। ज्योतिष मठ संस्थान के अनुसार, धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु जैसे प्राचीन धर्मग्रंथों में ऐसा कोई भी उल्लेख नहीं मिलता है जो पहली बार व्रत रखने पर किसी तरह की बाधा पैदा करता हो।

पंचांग के अनुसार इस बार 29 अक्टूबर को करवा चौथ का पावन पर्व मनाया जाएगा और इस दौरान चंद्रमा के उदय होने का समय रात 8:24 बजे निर्धारित किया गया है। व्रत रखने वाली महिलाओं को चंद्रोदय के तय समय के साथ-साथ मौसमी बदलावों का भी विशेष रूप से ध्यान रखना पड़ सकता है, क्योंकि बादलों और हल्की बूंदाबांदी की स्थिति के चलते कुछ स्थानों पर चंद्रमा के दर्शन के लिए थोड़ा अधिक इंतजार करना पड़ सकता है।

शास्त्रों के अनुसार, जब चंद्रमा क्षितिज से थोड़ा ऊपर उठकर अपनी प्राकृतिक लालिमा और शीतलता के साथ दिखाई दे, तभी उन्हें अर्घ्य देकर अपनी पूजा संपन्न करनी चाहिए। इस साल करवा चौथ के मौके पर बेहद खास संयोग बन रहा है, जिसमें रोहिणी और मृगशिरा नक्षत्र के साथ-साथ शिवयोग का अद्भुत मेल देखने को मिलेगा।

ज्योतिषीय दृष्टि से इस दिन चंद्रमा का अपनी उच्च राशि वृषभ में होना वैवाहिक जीवन में प्रेम, विश्वास और सौहार्द का प्रतीक माना जाता है। यह दुर्लभ खगोलीय संयोग पति-पत्नी के आपसी रिश्तों को और अधिक मधुर बनाने की कामना से जुड़े इस पर्व को अत्यधिक महत्वपूर्ण और फलदायी बनाता है। इसके अलावा, 28 अक्टूबर को शुक्र का उदय हो जाने के कारण करवा चौथ पर किसी भी तरह के शुक्रास्त का दोष नहीं रहेगा और इस दिन भद्रा की भी कोई बाधा नहीं है।

बंगाल क्षेत्र में इस पर्व को ‘दशरथ चतुर्थी’ के नाम से भी जाना जाता है और इस बार व्रत की तैयारी कर रही महिलाएं किसी भी प्रकार की भ्रामक बातों से दूर रहकर पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ इस पावन पर्व को मना सकती हैं। सोशल मीडिया पर पहली बार व्रत करने वाली महिलाओं को लेकर फैलाए जा रहे तमाम भ्रम पूरी तरह से निराधार और गलत हैं।

व्रत की विधि के अंतर्गत महिलाओं को सूर्योदय से पूर्व स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए और अपनी सास द्वारा दी गई सरगी को ग्रहण करना चाहिए। इसके पश्चात माता पार्वती, भगवान शिव और श्री गणेश का स्मरण करते हुए निर्जला या फलाहार व्रत का संकल्प लिया जाता है। संध्या के समय पूजा स्थल पर देवी-देवताओं की विधिवत आराधना कर व्रत की कथा पढ़ी या सुनी जाती है और दीपक जलाकर सुखी वैवाहिक जीवन की प्रार्थना की जाती है। रात्रि के समय चंद्रमा के निकलने पर छलनी से उनके दर्शन कर चंद्रदेव को जल से अर्घ्य दिया जाता है और अंत में पति का चेहरा देखकर इस कठिन व्रत को खोला जाता है।

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