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September 7, 2026 5:13 pm

कॉपर बढ़ने से शरीर को हो सकता है नुकसान! Wilson Disease के इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

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नई दिल्ली: शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कॉपर यानी तांबा एक जरूरी खनिज है, लेकिन कुछ दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों में शरीर अतिरिक्त कॉपर को ठीक से बाहर नहीं निकाल पाता। ऐसी ही बीमारी है Wilson Disease, जिसमें कॉपर धीरे-धीरे खासतौर पर लीवर, दिमाग और आंखों में जमा हो सकता है। समय पर पहचान और इलाज न मिलने पर यह अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है।

क्या है Wilson Disease?

Wilson Disease एक आनुवंशिक बीमारी है। इसमें ATP7B जीन में बदलाव के कारण शरीर अतिरिक्त कॉपर को सामान्य तरीके से बाहर नहीं निकाल पाता। नतीजतन कॉपर शरीर के अलग-अलग अंगों में जमा होने लगता है। यह बीमारी जन्म से मौजूद हो सकती है, लेकिन इसके लक्षण बाद में दिखाई दे सकते हैं।

लीवर से जुड़े ये लक्षण दिख सकते हैं

कॉपर के जमा होने का असर सबसे पहले या प्रमुख रूप से लीवर पर पड़ सकता है। इसके कारण कुछ लोगों में थकान, भूख कम लगना, मतली, उल्टी या पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

इसके अलावा त्वचा और आंखों का पीला पड़ना यानी पीलिया, गहरे रंग का पेशाब और पैरों या पेट के आसपास सूजन भी लीवर से जुड़ी समस्या के संकेत हो सकते हैं।

दिमाग और नर्वस सिस्टम पर भी असर

जब कॉपर दिमाग और तंत्रिका तंत्र में जमा होने लगता है, तो कुछ लोगों में हाथ-पैर में कंपकंपी, मांसपेशियों में जकड़न, शरीर के तालमेल में परेशानी, बोलने या निगलने में दिक्कत जैसे लक्षण हो सकते हैं।

कुछ मरीजों में मूड, व्यवहार या व्यक्तित्व में बदलाव भी देखने को मिल सकते हैं। हालांकि ऐसे लक्षण कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं में भी हो सकते हैं, इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर Wilson Disease का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

आंखों में दिख सकता है खास संकेत

Wilson Disease से जुड़े मरीजों में Kayser-Fleischer rings दिखाई दे सकते हैं। ये आंख की कॉर्निया के किनारे हरे, सुनहरे या भूरे रंग के छल्ले जैसे दिखाई देते हैं। डॉक्टर इन्हें विशेष आंखों की जांच यानी slit-lamp examination के जरिए देख सकते हैं।

बीमारी की जांच कैसे होती है?

डॉक्टर Wilson Disease की जांच के लिए मरीज की मेडिकल और पारिवारिक हिस्ट्री के साथ शारीरिक और आंखों की जांच कर सकते हैं। इसके बाद रक्त जांच, 24 घंटे के यूरिन टेस्ट और जरूरत पड़ने पर लीवर बायोप्सी या इमेजिंग टेस्ट किए जा सकते हैं।

रक्त जांच में ceruloplasmin, कॉपर और लीवर एंजाइम जैसे संकेतकों की जांच की जा सकती है। कुछ मामलों में बीमारी से जुड़े जीन में बदलाव की जांच के लिए जेनेटिक टेस्ट भी किया जाता है।

इलाज संभव है, लेकिन जल्दी पहचान जरूरी

Wilson Disease का इलाज संभव है और जल्दी पहचान होने पर शरीर में कॉपर के स्तर को नियंत्रित करने तथा आगे होने वाले नुकसान को रोकने में मदद मिल सकती है। इलाज के लिए डॉक्टर ऐसी दवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं जो शरीर से अतिरिक्त कॉपर हटाने या उसके अवशोषण को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। इलाज आमतौर पर लंबे समय तक चलता है।

कब डॉक्टर से संपर्क करें?

अगर किसी व्यक्ति में पीलिया, लगातार लीवर से जुड़ी परेशानी, बिना स्पष्ट कारण कंपकंपी या तालमेल बिगड़ने जैसे लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। खासकर परिवार में Wilson Disease का इतिहास हो तो डॉक्टर को इसकी जानकारी जरूर दें।

ध्यान रखें: शरीर में कॉपर बढ़ना हर बार Wilson Disease का मतलब नहीं होता। सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी है। खुद से कोई दवा शुरू या बंद करने के बजाय डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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