देश के रियल एस्टेट बाजार में हाल के वर्षों में बड़े और महंगे घरों की मांग तेजी से बढ़ी थी। कोरोना के बाद बेहतर आय वाले परिवारों और निवेशकों के बीच बड़े घरों को लेकर खास दिलचस्पी देखने को मिली। लेकिन अब इस ट्रेंड में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। हाउसिंग मार्केट में कुल बुकिंग की रफ्तार धीमी हुई है और इसका असर खास तौर पर बड़े आकार के घरों की बिक्री पर दिखाई दे रहा है।
रियल एस्टेट सेक्टर के आंकड़ों और बाजार रिपोर्टों के मुताबिक, घर खरीदने वाले अब कीमत, लोकेशन और जरूरत के हिसाब से ज्यादा सावधानी से फैसला ले रहे हैं। बढ़ती कीमतों के बीच कई खरीदार बड़े घरों के बजाय अपेक्षाकृत छोटे और किफायती विकल्पों की तरफ रुख कर रहे हैं। इससे बड़े फ्लैट और लग्जरी सेगमेंट में बिक्री की रफ्तार पर दबाव बढ़ा है।
बड़े घरों की डिमांड क्यों घटी?
बड़े घरों की मांग में आई नरमी के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण माने जा रहे हैं। पहला कारण है घरों की बढ़ती कीमतें और दूसरा कारण है खरीदारों का बदलता नजरिया। बीते कुछ समय में प्रॉपर्टी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में बड़े फ्लैट खरीदने के लिए खरीदारों को ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ रही है।
एक सामान्य परिवार के लिए घर की कीमत के साथ-साथ होम लोन की EMI, रजिस्ट्रेशन, स्टांप ड्यूटी, मेंटेनेंस और इंटीरियर जैसी लागत भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए कई खरीदार अब अपनी जरूरत के मुताबिक घर चुन रहे हैं, न कि केवल ज्यादा बड़ा घर खरीदने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
दूसरा बड़ा कारण- किफायती घरों की तरफ बढ़ता झुकाव
दूसरा बड़ा कारण खरीदारों की प्राथमिकताओं में बदलाव है। महंगे घरों की कीमत बढ़ने के साथ खरीदारों का एक वर्ग अब ऐसे घरों की तलाश कर रहा है, जिनकी कुल लागत उसके बजट में रहे। खासकर पहली बार घर खरीदने वाले लोग बड़े घर की जगह बेहतर कनेक्टिविटी, सुविधाओं और कम EMI वाले विकल्पों को प्राथमिकता दे सकते हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि बड़े घरों की मांग पूरी तरह खत्म हो गई है। प्रीमियम और लग्जरी सेगमेंट में अभी भी मजबूत खरीदार मौजूद हैं। हालांकि, इस सेगमेंट में खरीदारी जरूरत की बजाय आर्थिक क्षमता और निवेश के नजरिए से ज्यादा जुड़ी होती है। इसलिए बाजार में किसी भी अनिश्चितता का असर यहां अपेक्षाकृत जल्दी दिखाई दे सकता है।
बिल्डरों के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
बड़े घरों और लग्जरी प्रोजेक्ट्स में बिल्डरों की प्रति यूनिट बिक्री कीमत ज्यादा होती है। ऐसे में अगर इन घरों की बुकिंग धीमी होती है तो प्रोजेक्ट की बिक्री गति और कैश फ्लो पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि डेवलपर्स अब नए प्रोजेक्ट लॉन्च करते समय बाजार की मांग को ज्यादा ध्यान से देख रहे हैं।
कुछ डेवलपर्स ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए बेहतर पेमेंट प्लान, शुरुआती ऑफर और अलग-अलग आकार के घरों के विकल्प उपलब्ध करा रहे हैं। वहीं कई प्रोजेक्ट्स में लोकेशन, सुविधाओं और कनेक्टिविटी को प्रमुख बिक्री बिंदु बनाया जा रहा है।
क्या छोटे घरों की मांग बढ़ेगी?
अगर बड़े घरों की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो छोटे और मध्यम आकार के घरों की मांग को फायदा मिल सकता है। खरीदारों के लिए सिर्फ घर का आकार ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि कुल खरीद लागत भी अहम है। ऐसे में कम कीमत वाला घर, कम लोन और कम EMI कई परिवारों के लिए ज्यादा आकर्षक विकल्प बन सकता है।
हालांकि, रियल एस्टेट बाजार में शहर के हिसाब से तस्वीर अलग हो सकती है। मुंबई, दिल्ली-NCR, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे बड़े शहरों में जमीन की कीमत, रोजगार और कनेक्टिविटी के कारण घरों की मांग के पैटर्न अलग-अलग हैं। इसलिए पूरे देश के बाजार को एक ही ट्रेंड के आधार पर देखना सही नहीं होगा।
आगे कैसी रह सकती है स्थिति?
आने वाले समय में हाउसिंग मार्केट की दिशा कई बातों पर निर्भर करेगी। ब्याज दरें, होम लोन की उपलब्धता, आय में बढ़ोतरी, प्रॉपर्टी की कीमत और रोजगार की स्थिति खरीदारों के फैसले को प्रभावित करेंगे। अगर घरों की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं और खरीदारों की आय उसी गति से नहीं बढ़ती, तो बड़े घरों की मांग पर दबाव बना रह सकता है।
दूसरी ओर, अगर आर्थिक गतिविधियां मजबूत रहती हैं और लोगों की आय तथा खरीद क्षमता बढ़ती है, तो प्रीमियम हाउसिंग सेगमेंट में फिर से तेजी आ सकती है।
निष्कर्ष: बड़े घरों की मांग में नरमी को रियल एस्टेट सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है। बढ़ती कीमतें और खरीदारों का किफायती विकल्पों की ओर झुकाव फिलहाल दो प्रमुख वजहें हैं। हालांकि, लग्जरी हाउसिंग की मांग पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और अलग-अलग शहरों में इसका ट्रेंड अलग रह सकता है। खरीदारों और बिल्डरों दोनों के लिए आने वाले महीनों के आंकड़े यह तय करने में अहम होंगे कि यह सिर्फ अस्थायी बदलाव है या हाउसिंग मार्केट में प्राथमिकताओं का बड़ा परिवर्तन।








