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September 7, 2026 11:04 am

CDS ने बताया भविष्य के युद्ध का फॉर्मूला! जमीन-समुद्र-आसमान से साइबर तक मल्टी-डोमेन तैयारी पर जोर

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चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल एन.एस. राजा सुब्रमणि ने बदलते युद्धक्षेत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा की नई चुनौतियों को लेकर महत्वपूर्ण बातें कहीं। आजतक की ‘सुरक्षा सभा’ में अपने संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि आधुनिक दौर में युद्ध किसी एक मोर्चे तक सीमित नहीं रह गया है। जमीन, समुद्र और हवा के साथ साइबर, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रॉनिक और सूचना के क्षेत्र भी सुरक्षा के लिहाज से अहम हो गए हैं।

मल्टी-डोमेन ऑपरेशन पर जोर

CDS ने कहा कि भविष्य के संघर्षों में अलग-अलग सैन्य क्षेत्रों को एक-दूसरे से जोड़कर काम करना जरूरी होगा। उनके मुताबिक केवल तीनों सेनाओं के बीच समन्वय पर्याप्त नहीं है, बल्कि मल्टी-डोमेन इंटीग्रेशन की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

रक्षा मंत्रालय भी हाल के कार्यक्रमों में मल्टी-डोमेन संघर्ष की तैयारी, तीनों सेनाओं के बेहतर एकीकरण और तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने पर जोर देता रहा है।

बदल रहा है युद्ध का स्वरूप

CDS के मुताबिक आधुनिक दौर में शांति और युद्ध के बीच की पारंपरिक रेखा तेजी से बदल रही है। आर्थिक दबाव, साइबर गतिविधियां, सूचना अभियान और तकनीकी प्रतिस्पर्धा जैसे क्षेत्र भी राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।

इसका मतलब यह है कि किसी देश की सुरक्षा केवल सीमा पर सैनिकों की मौजूदगी से तय नहीं होगी। तकनीकी क्षमता, नेटवर्क, सूचना और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।

AI और डेटा की बढ़ती भूमिका

जनरल सुब्रमणि ने आधुनिक युद्धक्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा आधारित निर्णय लेने की बढ़ती भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज जानकारी की कमी नहीं है, बल्कि बड़ी चुनौती सही जानकारी को समय पर पहचानकर उसके आधार पर निर्णय लेना है।

रक्षा मंत्रालय के Future Warfare Course में भी AI, साइबर क्षमताओं, ऑटोनॉमस सिस्टम, सूचना युद्ध, अंतरिक्ष तकनीक और डेटा आधारित निर्णय प्रक्रिया को भविष्य के संघर्षों के महत्वपूर्ण हिस्से के तौर पर रेखांकित किया गया है।

‘सेंसर से निर्णय तक’ कम हो रहा समय

CDS ने युद्धक्षेत्र में बढ़ती पारदर्शिता का जिक्र करते हुए बताया कि निगरानी तकनीक, सेंसर और नेटवर्क के कारण घटनाओं की जानकारी तेजी से सामने आती है। ऐसे माहौल में जिस पक्ष के पास बेहतर जानकारी, मजबूत नेटवर्क और तेज निर्णय लेने की क्षमता होगी, उसे रणनीतिक लाभ मिल सकता है।

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि तकनीक का महत्व केवल ज्यादा दूर तक देखने में नहीं, बल्कि उपलब्ध जानकारी को समझने और उसका प्रभावी इस्तेमाल करने में है।

तीनों सेनाओं के बीच और बेहतर तालमेल जरूरी

CDS ने जॉइंटनेस को भविष्य की सैन्य तैयारी का अहम हिस्सा बताया। उनका कहना है कि जमीन, समुद्र, हवा, अंतरिक्ष और साइबर जैसे क्षेत्रों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता।

भारत में मल्टी-डोमेन ऑपरेशन को लेकर पहले से ही प्रशिक्षण और रणनीतिक चर्चा चल रही है। अप्रैल 2026 के ‘रण संवाद’ में भी भौतिक, सिंथेटिक और कॉग्निटिव क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल तथा AI आधारित युद्धक्षेत्र में तेज निर्णय लेने पर जोर दिया गया था।

आत्मनिर्भरता और मजबूत लॉजिस्टिक्स भी जरूरी

CDS ने तकनीकी आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय लचीलेपन को भी सुरक्षा तैयारियों से जोड़कर देखा। लंबे संकट के दौरान किसी भी देश की क्षमता केवल हथियारों या सैन्य प्लेटफॉर्म से नहीं, बल्कि उसकी आपूर्ति व्यवस्था, औद्योगिक क्षमता, मरम्मत और उत्पादन क्षमता से भी प्रभावित होती है।

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने का उद्देश्य महत्वपूर्ण उपकरणों और आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए बाहरी निर्भरता को कम करना भी है।

राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ सेना की जिम्मेदारी नहीं

अपने संबोधन में CDS ने राष्ट्रीय सुरक्षा को व्यापक जिम्मेदारी बताया। उन्होंने सरकार, उद्योग, तकनीकी क्षेत्र, अकादमिक संस्थानों और समाज की भूमिका पर भी जोर दिया।

उनके मुताबिक बदलते सुरक्षा वातावरण में भारत को ऐसी तैयारी की जरूरत है जो पारंपरिक सैन्य क्षमताओं के साथ नई तकनीकों और नए क्षेत्रों को भी जोड़ सके।

भविष्य के युद्ध के लिए बदलनी होगी तैयारी

CDS के संबोधन का मुख्य संदेश यही रहा कि भविष्य के संघर्ष पहले की तुलना में ज्यादा जटिल और बहु-क्षेत्रीय हो सकते हैं। ऐसे में जमीन, समुद्र और हवा के साथ साइबर, अंतरिक्ष, इलेक्ट्रॉनिक और सूचना क्षेत्रों में समन्वित तैयारी जरूरी होगी।

भारत के लिए चुनौती केवल नई तकनीक अपनाने की नहीं, बल्कि तीनों सेनाओं, उद्योग, तकनीकी संस्थानों और अन्य राष्ट्रीय संसाधनों को एक व्यापक सुरक्षा ढांचे में जोड़ने की भी है।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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