








मात्र मुँह से बोल देने भर से ईश्वर के चुने हुए भक्त शुचिता प्राप्त नहीं कर सकते, अपितु धैर्यवान जीवन और लगातार सेवाकार्यों में प्रवत्त

तुम उनके लिए दीपक के समान बनो जो अंधकार में हैं, दुःखी लोगों के लिए आनन्द, प्यासों के लिए एक सागर, व्यथित के लिए संबल,
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