पेशाब और मूत्राशय से जुड़ी जटिल समस्याओं की जांच के क्षेत्र में दिल्ली के VMMC और सफदरजंग अस्पताल में एक नई सुविधा शुरू की गई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने 3 सितंबर 2026 को अस्पताल के यूरोलॉजी विभाग में Centre for Advanced Bladder Diagnostics का उद्घाटन किया। इस सेंटर में ब्लैडर की कार्यप्रणाली की जांच के साथ ब्रेन मैपिंग की सुविधा भी जोड़ी गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, भारत में इस तरह का संयोजन पहली बार आजमाया जा रहा है।
क्या है Bladder Mapping?
ब्लैडर यानी मूत्राशय हमारे शरीर में पेशाब को कुछ समय के लिए जमा करने और फिर बाहर निकालने का काम करता है। इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ ब्लैडर ही नहीं, बल्कि नसों और दिमाग की भूमिका भी होती है।
सफदरजंग अस्पताल में शुरू की गई नई सुविधा में Video Urodynamics (VUDS) को Near Infrared Spectroscopy (NIRS) आधारित ब्रेन मैपिंग के साथ जोड़ा गया है। इससे डॉक्टर ब्लैडर के काम करने के तरीके के साथ यह भी देख सकते हैं कि ब्लैडर के भरने और खाली होने के दौरान दिमाग में रक्त के ऑक्सीजन स्तर में किस तरह के बदलाव हो रहे हैं।
कैसे काम करती है यह तकनीक?
इस तकनीक में Video Urodynamics के जरिए ब्लैडर की कार्यप्रणाली का आकलन किया जाता है। वहीं NIRS आधारित ब्रेन मैपिंग के माध्यम से ब्लैडर की गतिविधि के दौरान मस्तिष्क में होने वाले ऑक्सीजन संबंधी बदलावों को देखा जाता है।
इससे डॉक्टरों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि मरीज की समस्या मुख्य रूप से ब्लैडर से जुड़ी है, न्यूरोलॉजिकल कारणों से है या दोनों का संयोजन है।
यानी जिन मामलों में यह स्पष्ट करना मुश्किल होता है कि पेशाब से जुड़ी समस्या का मूल कारण मूत्राशय है या तंत्रिका तंत्र, वहां यह जांच डॉक्टरों के लिए अतिरिक्त जानकारी उपलब्ध करा सकती है।
किन मरीजों को हो सकता है फायदा?
यह सुविधा खास तौर पर उन मरीजों के लिए उपयोगी हो सकती है जिनकी पेशाब से जुड़ी समस्या जटिल है या जिनमें न्यूरोलॉजिकल कारणों की आशंका होती है।
स्वास्थ्य अधिकारियों के मुताबिक, उम्र बढ़ने, रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याओं और कुछ न्यूरोलॉजिकल स्थितियों में ब्लैडर के सामान्य कामकाज पर असर पड़ सकता है। ऐसे मामलों में ब्लैडर की कार्यप्रणाली और उससे जुड़े तंत्रिका तंत्र की गतिविधि को एक साथ समझना इलाज की योजना बनाने में मदद कर सकता है।
हर साल करीब 5 हजार मरीजों को फायदा
सफदरजंग अस्पताल में शुरू किए गए Centre for Advanced Bladder Diagnostics से हर साल करीब 5,000 मरीजों को लाभ मिलने की उम्मीद है। इसका उद्देश्य जटिल यूरोलॉजिकल समस्याओं के लिए बेहतर और अधिक विस्तृत डायग्नोस्टिक सुविधा उपलब्ध कराना है।
सरकारी अस्पताल में यह सुविधा शुरू होने से ऐसे मरीजों को भी उन्नत जांच की सुविधा मिल सकेगी, जिन्हें जटिल ब्लैडर या न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के कारण विशेष मूल्यांकन की जरूरत होती है।
सिर्फ ब्लैडर ही नहीं, PET-CT और SPECT-CT भी शुरू
सफदरजंग अस्पताल में ब्लैडर डायग्नोस्टिक्स सेंटर के साथ PET-CT और SPECT-CT सुविधाओं का भी उद्घाटन किया गया है। ये सेवाएं न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में शुरू की गई हैं।
PET-CT का इस्तेमाल कैंसर की जांच, बीमारी की स्थिति का आकलन, उपचार की योजना और फॉलो-अप जैसी जरूरतों में किया जा सकता है। वहीं SPECT-CT हृदय, किडनी, एंडोक्राइन, हड्डियों और पाचन तंत्र से जुड़ी कई स्थितियों की जांच में मदद कर सकता है।
इन नई न्यूक्लियर मेडिसिन सेवाओं से हर साल करीब 600 से 700 मरीजों को लाभ मिलने की उम्मीद है।
मरीजों को क्या फायदा होगा?
नई तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि डॉक्टरों को ब्लैडर की समस्या को समझने के लिए पहले की तुलना में ज्यादा विस्तृत जानकारी मिल सकती है। खासकर ऐसे मामलों में जहां सामान्य जांच से समस्या का कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाता, ब्लैडर फंक्शन और ब्रेन गतिविधि से जुड़ी जानकारी उपयोगी हो सकती है।
हालांकि, किसी भी जांच की तरह इसका इस्तेमाल मरीज की स्थिति और डॉक्टर की सलाह के अनुसार किया जाएगा। हर पेशाब संबंधी समस्या में इस तरह की उन्नत जांच की आवश्यकता जरूरी नहीं होती।
क्या यह ब्लैडर की हर बीमारी का इलाज है?
नहीं। Bladder Mapping एक डायग्नोस्टिक सुविधा है, कोई अपने आप में इलाज नहीं। इसका उद्देश्य समस्या के कारण और ब्लैडर की कार्यप्रणाली को बेहतर तरीके से समझने में डॉक्टरों की मदद करना है। इसके बाद मरीज की स्थिति के आधार पर विशेषज्ञ आगे की जांच या उपचार तय कर सकते हैं।
निष्कर्ष
सफदरजंग अस्पताल में शुरू हुआ Centre for Advanced Bladder Diagnostics यूरोलॉजी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण नई सुविधा है। Video Urodynamics को NIRS आधारित ब्रेन मैपिंग से जोड़कर डॉक्टरों को ब्लैडर और न्यूरोलॉजिकल सिस्टम के बीच संबंध को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है।
सरकार के अनुसार, भारत में इस तरह का संयोजन पहली बार आजमाया जा रहा है और सेंटर से सालाना करीब 5,000 मरीजों को लाभ मिलने की उम्मीद है।








