नई दिल्ली। दीपावली के त्योहार के दौरान घरेलू विमान सेवाओं के किराए में हो रही भारी बढ़ोतरी का मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस मामले में तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया। सुनवाई की मांग रखे जाने पर अदालत की पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि हवाई टिकटें महंगी हैं और आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रही हैं, तो यात्रियों को हवाई सफर करने से बचना चाहिए। दरअसल, त्योहारी सीजन में विमानन कंपनियों की ओर से टिकटों के दामों में कथित तौर पर सात गुना यानी 700 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी किए जाने का मुद्दा अदालत के सामने उठाया गया था। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि त्योहारों के समय बड़ी संख्या में लोग अपने घरों तक पहुंचने के लिए हवाई यात्रा पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में किराए में इतनी अधिक वृद्धि आम यात्रियों के लिए परेशानी का कारण बन रही है।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विशेष उल्लेख के माध्यम से रखा गया था। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि वर्तमान समय में हवाई यात्रा केवल विलासिता का साधन नहीं रह गई है, बल्कि कई लोगों के लिए यह जरूरत बन चुकी है। खासकर त्योहारों और छुट्टियों के दौरान बड़ी संख्या में लोग अपने परिवारों के पास जाने के लिए विमान सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे समय में एयरलाइंस की ओर से टिकटों की कीमतों में मनमाने तरीके से भारी बढ़ोतरी करना यात्रियों के हितों के खिलाफ है। वकील ने यह भी तर्क दिया कि किराए में इस तरह की असमानता और अत्यधिक वृद्धि संविधान में दिए गए समानता के अधिकार से जुड़े सवाल खड़े करती है। इसलिए अदालत को इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। हालांकि, पीठ ने तत्काल सुनवाई की मांग स्वीकार नहीं की और मामले को उस समय आगे नहीं बढ़ाया।
दरअसल, यह मामला विमानन क्षेत्र में टिकटों की कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था से जुड़ी एक पुरानी जनहित याचिका के तहत दायर अंतरिम आवेदन का हिस्सा है। इस याचिका में विमानन कंपनियों की ओर से अपनाई जाने वाली कथित अपारदर्शी, शोषणकारी और एल्गोरिथ्म आधारित किराया निर्धारण प्रणाली को चुनौती दी गई है। इसमें विशेष रूप से अंतिम समय में हवाई टिकटों के दामों में होने वाली असाधारण बढ़ोतरी और यात्रियों से वसूले जाने वाले विभिन्न अतिरिक्त शुल्कों पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि टिकटों की कीमत तय करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी के कारण यात्रियों को कई बार वास्तविक किराए से कहीं अधिक रकम चुकानी पड़ती है।
इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट विमान किराए में लगातार होने वाले उतार-चढ़ाव और इस पर नियंत्रण रखने वाली व्यवस्था को लेकर चिंता जता चुका है। पिछली सुनवाइयों के दौरान अदालत ने कहा था कि निजी विमानन कंपनियों की ओर से वसूले जाने वाले किराए को तर्कसंगत बनाने की आवश्यकता है। अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया था कि एक ही दिन और एक ही मार्ग पर संचालित होने वाली अलग-अलग उड़ानों के टिकटों की कीमतों में काफी अंतर देखने को मिलता है। कई बार एक एयरलाइन उसी मार्ग पर अपेक्षाकृत कम किराया लेती है, जबकि दूसरी कंपनी समान सेवा के लिए यात्रियों से कई गुना अधिक रकम वसूलती है। इस तरह की मूल्य असमानता को लेकर अदालत ने पारदर्शी और प्रभावी नियामक व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया था।
इस पूरे मामले के बीच केंद्र सरकार पहले ही सुप्रीम कोर्ट को विमान किराए की संरचना और अतिरिक्त शुल्कों को नियंत्रित करने के लिए नए नियम तैयार किए जाने की जानकारी दे चुकी है। सरकार ने अदालत को बताया था कि विमानन कंपनियों की ओर से वसूले जाने वाले विभिन्न शुल्कों और टिकटों की कीमतों को विनियमित करने के लिए नए प्रावधान तैयार कर लिए गए हैं। इन नियमों को अंतिम रूप देने के साथ प्रशासनिक मंजूरी भी मिल चुकी है। इसके बाद सरकार ने नए नियमों को अधिसूचित करने की प्रक्रिया पूरी की। यह नया नियामक ढांचा दशकों पुराने विमानन नियमों की जगह लेने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
नए नियमों के तहत विमानन कंपनियों के लिए टिकटों की कीमतों से संबंधित पूरी जानकारी यात्रियों को उपलब्ध कराना आवश्यक होगा। एयरलाइंस को टिकट की मूल कीमत यानी बेस फेयर, उस पर लगने वाले टैक्स, अन्य अतिरिक्त शुल्क और टिकट से संबंधित सभी जरूरी खर्चों का स्पष्ट विवरण देना होगा। इसके अलावा टिकट रद्द कराने, रिफंड प्राप्त करने और अन्य संबंधित नीतियों की जानकारी भी यात्रियों को पारदर्शी तरीके से उपलब्ध करानी होगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यात्री टिकट बुक करने से पहले यह समझ सकें कि उन्हें कुल कितनी रकम चुकानी होगी और टिकट रद्द कराने की स्थिति में किन शर्तों का पालन करना पड़ेगा।
नए नियामक प्रावधानों के लागू होने के बाद विमानन कंपनियों की किराया निर्धारण प्रक्रिया पर नियामक प्राधिकारी की निगरानी भी अधिक प्रभावी होने की उम्मीद है। इससे टिकटों की कीमतों और अतिरिक्त शुल्कों को लेकर यात्रियों के बीच बनी अनिश्चितता कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, किराया निर्धारण में एल्गोरिथ्म आधारित प्रणाली की भूमिका और अलग-अलग समय पर टिकटों की कीमतों में होने वाले बदलावों को लेकर पारदर्शिता सुनिश्चित करना अभी भी एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।
दीपावली जैसे बड़े त्योहारों के दौरान हवाई टिकटों की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी का सीधा असर मध्यमवर्गीय और सामान्य परिवारों पर पड़ता है। त्योहारों के समय घर जाने की योजना बनाने वाले यात्रियों को कई बार सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक किराया चुकाना पड़ता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में उठाया गया यह मुद्दा विमानन क्षेत्र में किराया निर्धारण की व्यवस्था, यात्रियों के अधिकारों और सरकारी नियमन की आवश्यकता से जुड़ी व्यापक बहस को सामने लाता है। फिलहाल अदालत ने तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया है, लेकिन विमान किराए में पारदर्शिता और मनमानी बढ़ोतरी पर नियंत्रण का मुद्दा न्यायिक और नीतिगत स्तर पर महत्वपूर्ण बना हुआ है।








