नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि जांच एजेंसी (अभियोजन पक्ष) किसी लोक सेवक के पास उसकी वैध आय से अधिक संपत्ति होने का प्राथमिक मामला सिद्ध कर देती है, तो उस अतिरिक्त संपत्ति के स्रोत का ब्योरा देने की जिम्मेदारी स्वयं आरोपी की होगी। कोर्ट ने साफ किया कि जांच एजेंसियों को आरोपी द्वारा बाद में किए जाने वाले हर संभावित या काल्पनिक दावों की ‘अनंत खोज’ करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने केरल सरकार के पूर्व अधिकारी वी. गोपालकृष्णन की सजा के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने कहा कि कानून के अनुसार लोक सेवक को विश्वसनीय और सत्यापन योग्य साक्ष्यों के जरिए यह साबित करना होगा कि उसकी संपत्तियां वैध स्रोतों से अर्जित की गई हैं, क्योंकि अघोषित धन के स्रोत और उसकी प्राप्ति की जानकारी केवल आरोपी के पास ही होती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष को केवल वैध आय, संपत्ति और खर्च से जुड़े मूलभूत तथ्यों को साबित करना होता है। इसके बाद सबूत पेश करने का भार आरोपी पर स्थानांतरित हो जाता है और यदि वह संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहता है, तो अदालत उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकती है।
मामला केरल के एक पूर्व सब-रजिस्ट्रार वी. गोपालकृष्णन से जुड़ा है, जिन पर 1993 से 2001 के बीच अपनी ज्ञात आय से लगभग 51.88 प्रतिशत अधिक संपत्ति जमा करने का आरोप था। आरोपी ने भवन निर्माण लागत और घरेलू खर्च के आकलन को चुनौती दी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि वह अपने दावों के समर्थन में कोई ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश करने में असमर्थ रहा। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत उनकी सजा को बरकरार रखते हुए उन्हें दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। उच्च न्यायालय ने मामले में हुई देरी और आरोपी की उम्र को देखते हुए उनकी सजा को एक साल के कारावास और 2 लाख रुपये के जुर्माने में बदल दिया था।








