चमोली (उत्तराखंड)। हिमालय की गोद में चल रहे एक महत्वाकांक्षी जलविद्युत परियोजना की सुरंग अचानक मौत का अड्डा बन गई। गुरुवार शाम करीब सात बजे जब अलकनंदा नदी पर बन रही विष्णुगाड़-पीपलकोटी परियोजना की टेल रेस टनल (टीआरटी) में मजदूर काम कर रहे थे, तभी अचानक जोरदार धमाके जैसी आवाज के साथ भारी मलबा और पानी सुरंग में घुस आया। महज कुछ ही पलों में टनल का लगभग डेढ़ से दो किलोमीटर का हिस्सा पानी, कीचड़ और पत्थरों से पट गया। मलबे की मात्रा इतनी ज्यादा थी कि बचाव दल के अधिकारी इसे चार मंजिला इमारत जितना ऊंचा और घना बता रहे हैं।
सुरंग के अंदर काम कर रहे करीब २२ मजदूर फंस गए। अचानक आई आपदा ने सबको हैरान कर दिया। पानी का तेज बहाव इतना शक्तिशाली था कि कई मजदूरों के कपड़े तक शरीर से उतर गए और मलबा दूर-दूर तक खिसक गया। सुरंग के अंदर ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरने लगा। अंधेरा, कीचड़, गले तक भरा पानी और सांस लेने के लिए पर्याप्त हवा न होना—ये हालात मजदूरों के लिए मौत से जंग बन गए।
रात भर चली जानलेवा जंग
हादसे की सूचना मिलते ही एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, स्थानीय प्रशासन, पुलिस और परियोजना कर्मियों की टीमें मौके पर पहुंच गईं। लेकिन बचाव अभियान आसान नहीं था। सुरंग के अंदर कई जगह तीन से पांच फीट गहरा पानी भरा था। तेज बहाव के कारण लापता मजदूरों की सही लोकेशन का अनुमान लगाना भी मुश्किल हो गया। ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण बचाव दल को भी एक-एक घंटे की शिफ्ट में काम करना पड़ रहा था। रात में हालात और बिगड़ गए। दलदल, पानी और ऑक्सीजन की कमी को देखते हुए कुछ समय के लिए अभियान रोकना पड़ा।
बचाव दल ने विशेष उपकरण, सक्शन पंप, गैस मास्क और ऑक्सीजन सिलेंडर के साथ सुरंग में प्रवेश किया। पानी निकालने और मलबा हटाने का काम युद्ध स्तर पर शुरू हुआ। कुछ मजदूरों को नीले ड्रम और विशेष उपकरणों की मदद से बाहर निकाला गया। घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार १२ मजदूर सुरक्षित बाहर निकाले गए, जबकि १० की मौत हो गई। कुछ दिन तक रेस्क्यू अभियान जारी रहा और आखिरकार सभी फंसे श्रमिकों का रेस्क्यू पूरा कर लिया गया।
“हर सांस के लिए जंग”
बचाव में शामिल एक अधिकारी ने बताया, “टनल के अंदर पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती थी। मलबा इतना घना और भारी था कि मशीनें भी आसानी से काम नहीं कर पा रही थीं। ऑक्सीजन मास्क लगाकर भी सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। मजदूरों तक पहुंचने के लिए हमें कीचड़ और पानी में घुटनों-घुटनों तक चलना पड़ रहा था।”
परियोजना अधिकारियों के अनुसार हादसा टनल के लगभग १.४४ से १.८ किलोमीटर अंदर हुआ। अचानक ऊपर से कैविटी टूटने या भूस्खलन के कारण पानी और मलबा अंदर घुस आया। कुछ रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि हादसे से पहले दो दिन से मलबा गिर रहा था, लेकिन उस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
परिवारों का इंतजार और सवाल
हादसे की खबर फैलते ही मजदूरों के परिवारों में मातम छा गया। कई परिवार दूसरे राज्यों से आए थे। मृतकों के परिजन मुआवजे और न्याय की मांग कर रहे हैं। मुख्यमंत्री और आपदा प्रबंधन मंत्री मौके पर पहुंचे और बचाव अभियान का जायजा लिया। सरकार ने मृतकों के परिजनों को मुआवजे का आश्वासन दिया है।
यह हादसा सिल्क्यारा टनल जैसी पुरानी घटनाओं की याद दिलाता है, जहां भी मजदूर लंबे समय तक मलबे में फंसे रहे थे। विशेषज्ञ कहते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में टनल निर्माण के दौरान भूगर्भीय संरचना, पानी के रिसाव और सुरक्षा मानकों पर और सख्ती से ध्यान देने की जरूरत है।
टनल में चार मंजिला इमारत जितना मलबा, ऑक्सीजन की कमी और जानलेवा पानी—ये सब मिलाकर यह घटना मजदूरों की जान बचाने की एक लंबी और मुश्किल जंग साबित हुई। बचाव दल की मेहनत से कई जिंदगियां बचाई गईं, लेकिन कई परिवार हमेशा के लिए उजड़ गए। अब सवाल यह है कि क्या भविष्य में ऐसे हादसों को रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जाएंगे?








