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June 5, 2026 8:30 pm

‘श्री पर्यावरण शतक’ का विमोचन

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हनुमान चालीसा की शैली में रचित पर्यावरण जागरूकता का अनुपम ग्रंथ

धार (मध्य प्रदेश), 5 जून 2026: विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर एक महत्वपूर्ण साहित्यिक और पर्यावरणीय योगदान सामने आया है। सेवानिवृत्त प्राचार्य एवं प्रसिद्ध विद्वान डॉ. तेज प्रकाश पूर्णा नंद व्यास द्वारा रचित ‘श्री पर्यावरण शतक’ जारी किया गया है।

यह शतक हनुमान चालीसा की शैली में रचित है और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत पर आधारित है। इसमें ‘सर्व जन सुखाय, सर्व जन हिताय’ की भावना के साथ पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति संवर्धन और पृथ्वी माता की रक्षा का संदेश दिया गया है।

डॉ. तेज प्रकाश पूर्णा नंद व्यास का यह कार्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि:

  • उन्होंने हनुमान चालीसा की लोकप्रिय छंद शैली को अपनाते हुए आधुनिक पर्यावरणीय चुनौतियों को सनातन संस्कृति के माध्यम से जोड़ा है।
  • ग्रंथ में पर्यावरण, जैव-विविधता, जल संरक्षण, वन संरक्षण और सतत विकास जैसे विषयों को सरल, छंदबद्ध और भावपूर्ण भाषा में प्रस्तुत किया गया है।
  • सुलभ, स्वच्छ और प्राणप्रद, फिर से बने जहान।
    रचूँ पर्यावरण शतक, सुनहु सकल बुधिमान ॥ ४ ॥
    तुलसीकृत रामायण की, चौपाई सुखकार।
    गाकर संकट दूर हों, महके यह संसार ॥ ५ ॥

    ​[भाग १: पर्यावरण चेतना और ग्लोबल वार्मिंग संकट (१-१२)]

    ​जय पर्यावरण सकल सुख खानी, तुम बिन जी न सके कोई प्राणी।
    ​पृथ्वी सूक्त वेद अस गावा, भूमि मात सब जीव जिलावा।
    ​गगन, वायु, पावक, जल, धरनी, इनकी महिमा जाए न बरनी।
    ​इन पाँचों का पावन मेला, प्रकृति देव का सुंदर खेला।
    ​आज भयो जग में संतापा, बढ़ गया धरती का सब तापा।
    ​ग्लोबल वार्मिंग संकट आयो, ओज़ोन परत को छेद लगायो।
    ​गरमी बढ़ती, बर्फ पिघलती, मौसम की गति चक्र बदलती।
    ​एसी, गाड़ी का अति उपयोगा, बढ़ा रहा जग के सब रोगा।
    ​कार्बन का धुआँ नभ छायो, प्राणवायु का काल बुलायो।
    ​फैक्टरी और मिलों के धुआँ, ज़हर उगलते जैसे कुआँ।
    ​न्यूनतम तापमान जो चाहो, विलासिता के साधन घटाओ।
    ​संयम से जब जीवन जीबो, शुद्ध हवा तब भीतर लीबो।

    ​[भाग २: वृक्षारोपण और जल संवर्धन – सुजलां सुफलां (१३-२४)]

    13.⁠ ⁠सुजलां सुफलां गीत सुहावा, वृक्ष बिना कोई फल नहीं पावा।
    14.⁠ ⁠जितने अधिक वृक्ष तुम लाओ, धरती का तापमान घटाओ।
    15.⁠ ⁠एक वृक्ष सौ पुत्र समाना, वेद पुरानन में अस जाना।
    16.⁠ ⁠नीम, पीपला, बरगद भाई, ये ही सच्चे मित्र सदाई।
    17.⁠ ⁠तुलसी, आम, कबीट लगाओ, वायुमंडल शुद्ध बनाओ।
    18.⁠ ⁠वृक्षन की जो सघन कतारा, सोखें पानी, रोकें धारा।
    19.⁠ ⁠बादल को ये दूर से लावें, धरती पर अमृत बरसावें।
    20 मिट जाता है सब संतापा, जब हर कोना हरियाली व्यापा ॥
    21.⁠ ⁠सूखी नदियाँ फिर बह निकलें, संकट सारे पल में पिघलें।
    22.⁠ ⁠पशु-पक्षी सब पावें श्रेया, तरुवर की शीतल है छैया।
    23.⁠ ⁠मानव! अब तुम आंखें खोलो, कुल्हाड़ी तज, पौधे रोपो।
    24.⁠ ⁠घर-घर एक बगीचा होवे, संकट काल शोक सब खोवे।

    ​[भाग ३: रूफ वाटर हार्वेस्टिंग – छत जल संचयन (२५-३६ – १२ चौपाइयां)]

    25.⁠ ⁠सुनो रे मानुष! परम उपाया, छत का पानी काम में लाया।
    26.⁠ ⁠रूफ वाटर हार्वेस्टिंग कीजै, बूंद-बूंद जल संचय कीजै।
    27.⁠ ⁠जब सावन की बरसे धारा, छत का पानी बहे अपारा।
    28.⁠ ⁠पाइप जोड़ उसे तुम रोको, नालों में बहने से टोको।
    29.⁠ ⁠छत के पानी को पहुंचाओ, भूमि के भीतर ले जाओ।
    30.⁠ ⁠एक बनाओ गहरा गढ्ढा, फिल्टर बेड जहाँ होवे पक्का।
    31.⁠ ⁠गिट्टी, रेत और कोयला डारो, पानी की सब मैल निवारो।
    32.⁠ ⁠भू-गर्भित जब होगा नीरा, मिट जाएगी जग की पीरा।
    33.⁠ ⁠कुएं, बावड़ी, बोर सुधारे, वाटर लेवल बढ़े तुम्हारे।
    34.⁠ ⁠बीस रुपये की बोतल छूटे, प्रकृति का अमृत न टूटे।
    35.⁠ ⁠यह विधि सरल और अति सयानी, हर घर संचित होवे पानी।
    36.⁠ ⁠छत का जल जो भूमि पावे, सात पीढ़ियाँ संकट न जावे।

    ​[भाग ४: एलम, ईटिंग चूना द्वारा जल शोधन (३७-४८)]

    37.⁠ ⁠पानी स्वच्छ रहे नभ जैसा, कुदरती शोधन करिए ऐसा।
    38.⁠ ⁠फिटकरी (एलम) हाथ में लीजै, गंदे जल में घूर्णन कीजै।
    39.⁠ ⁠एलम डारत ही मैल सब भागे, बैठ जाए नीचे अनुरागे।
    40.⁠ ⁠भारी कण सब नीचे जाहीं, निर्मल जल ऊपर मुसकाहीं।
    41.⁠ ⁠ईटिंग चूना (खाने का चूना) मद्धम डारो, पानी के सब जर्म्स निवारो।
    42.⁠ ⁠चूना पानी शुद्ध करत है, खनिजों से घट को भरत है।
    43.⁠ ⁠हड्डियों को यह ताकत देता, रोगों को सब हर है लेता।
    44.⁠ ⁠फिटकरी-चूना का यह मेला, करे शुद्धि का सुंदर खेला।
    45.⁠ ⁠बिना केमिकल जल साफ होई, पीकर बीमार न होवे कोई।
    46.⁠ ⁠प्राचीन काल की यह विधा, मिटाए जल की हर दुविधा।
    47.⁠ ⁠निर्मल नीर घट में जब आवे, काया का हर रोग मिटावे।
    48.⁠ ⁠स्वच्छ नीर ही उत्तम साजा, इसके बिना न रंक न राजा।

    ​[भाग ५: सहजन (Moringa) द्वारा जल शोधन (४९-६०)]

    49.⁠ ⁠मोरिंगा की महिमा अब गाऊँ, सहजन के गुण सबको सुनाऊँ।
    50.⁠ ⁠सहजन के जो बीज सुहाए, पानी साफ करन में आए।
    51.⁠ ⁠बीजों को तुम पहले सुखाओ, कूट-पीसकर चूर्ण बनाओ।
    52.⁠ ⁠गंदे पानी में चूर्ण मिलाओ, थोड़ी देर उसे हिलाओ।
    53.⁠ ⁠मोरिंगा के गुण अति भारी, मैल समेटे सब की सब सारी।
    54.⁠ ⁠कवक, बैक्टीरिया सब मर जाहीं, अशुद्धता का नाम न नाहीं।
    55.⁠ ⁠कुदरती फिल्टर इसे तुम मानो, बटन ऊपर कपड़े से जल छानो।
    56.⁠ ⁠यह तो है वरदान विधाता, जल को अमृत रूप बनाता।
    57.⁠ ⁠विटामिन्स से भरा है सहजन, रोग दूर करता यह अंजन।
    58.⁠ ⁠पानी भी साफ, भोजन भी पावन, सहजन रोपो जैसे सावन।
    59.⁠ ⁠गरीब-अमीर सब इसका काजा, मोरिंगा है पेड़ों का राजा।
    60.⁠ ⁠इस विधि से जो जल को धोवे, अकाल मृत्यु कभी न होवे।

    ​[भाग ६: सूर्य प्रकाश (Sun Light) का उपयोग और न्यूनतम तापमान (६१-७२)]
    61.⁠ ⁠सूर्य देव हैं ऊर्जा के सरोता (स्रोत
    62.⁠ ⁠), इनके बिना न कोई जग होता।
    62.⁠ ⁠धूप जो पावे उत्तम काया, भागे सब बीमारियों की छाया।
    63.⁠ ⁠सोलर एनर्जी अब अपनाओ, कोयले का तुम धुआँ बचाओ।
    64.⁠ ⁠धूप से बिजली जब बन जावे, कार्बन का ग्राफ घट जावे।
    65.⁠ ⁠सोलर हीटर, सोलर चूल्हा, इनसे पर्यावरण न झुलसा।
    66.⁠ ⁠घर की खिड़की खुली जो रखो, सूर्य प्रकाश का आनंद चखो।
    67.⁠ ⁠विटामिन-डी का यह भंडारा, इम्युनिटी बढ़ाए अपारा।
    68.⁠ ⁠दिन में बत्ती कभी न जलाई, सूर्य देव जब दें रोशनाई।
    69.⁠ ⁠कम ऊर्जा जब खर्च करेगी, धरती मैया शांत रहेगी।
    70.⁠ ⁠न्यूनतम तापमान जब होई, सुखी-शांत सोएगा

लेखक का परिचय

डॉ. तेज प्रकाश पूर्णा नंद व्यास बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं। वे पीएचडी (न्यूरोएंडोक्रिनोलॉजी), डी.लिट. (श्रीमद्भगवद्गीता, संस्कृति-संस्कार, संस्कृत एवं सनातन धर्म) तथा डी.एससी. (खुशी: शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य) की उपाधियों से सम्मानित हैं।

वे सरीसृप वैज्ञानिक (भारतीय उपमहाद्वीप) के रूप में IUCN SSC (स्विट्जरलैंड) से जुड़े रहे हैं। साथ ही एंटी एजिंग वैज्ञानिक, पादप पोषक तत्व विशेषज्ञ, हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के ऑनलाइन छात्र और अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन प्रमाणित CPR एवं लाइफ सपोर्ट सिस्टम परामर्शदाता भी हैं।

डॉ. व्यास पूर्व में शासकीय महाराजा भोज स्नातकोत्तर महाविद्यालय, धार के प्राचार्य रह चुके हैं।

महत्वपूर्ण संदेश

‘श्री पर्यावरण शतक’ का मुख्य उद्देश्य लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना और सनातन मूल्यों के माध्यम से प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करना है। लेखक का मानना है कि पृथ्वी की सुरक्षा मानव जाति की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और यह कार्य केवल विज्ञान या कानून से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना से भी संभव है।

यह शतक आमजन, छात्रों, शिक्षकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणादायी साबित होगा।


डॉ. तेज प्रकाश पूर्णा नंद व्यास के इस नए साहित्यिक कृति को साहित्यिक और पर्यावरण प्रेमियों द्वारा सराहा जा रहा है।


आपको यह न्यूज़ आर्टिकल कैसा लगा? चाहें तो मैं इसे और लंबा, छोटा, या अधिक प्रचारात्मक/भावुक शैली में भी बना सकता हूँ। बताएं क्या बदलाव चाहिए।

Sanjeevni Today
Author: Sanjeevni Today

Reporter

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