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April 1, 2026 8:59 pm

आज का पवित्र लेख

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हे चेतना के पुत्र !

पक्षी अपने नीड़ की कामना करता है और बुलबुल गुलाब के सौंदर्य की, जबकि मानवात्मा रूपी पखेरू क्षणभंगुर धूल से ही संतुष्ट हो अपने अमर नीड़ से बहुत दूर भटक चुके हैं और असावधानी के दलदल की ओर आंखें बंद किये दिव्य सान्निध्य के गौरव से वंचित हैं। हाय! कितना विचित्र और दयनीय है यह कि मात्र एक प्याली भर के लिए अपने परमोच्च के उमड़ते हुए सागर से उन्होंने अपना मुंह मोड़ लिया है और प्रभामंडित क्षितिज से दूर हो गये हैं।

 

बहाउल्लाह~

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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