साल 1971 में तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में चलाए गए सैन्य अभियान ऑपरेशन सर्चलाइट को लेकर एक बार फिर नई बहस शुरू हो गई है। इतिहासकारों, मानवाधिकार संगठनों और विभिन्न सामाजिक समूहों ने मांग उठाई है कि इस अभियान के दौरान बंगाली हिंदुओं और स्थानीय लोगों पर हुए अत्याचारों को आधिकारिक रूप से “जनसंहार” (Genocide) घोषित किया जाए। इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो रही है और पीड़ितों को न्याय दिलाने की मांग भी उठ रही है।
ऑपरेशन सर्चलाइट 25 मार्च 1971 को पाकिस्तान की सेना द्वारा शुरू किया गया एक सैन्य अभियान था, जिसका उद्देश्य पूर्वी पाकिस्तान में बढ़ रहे विद्रोह को दबाना बताया गया था। लेकिन कई इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का कहना है कि इस अभियान के दौरान बड़ी संख्या में आम नागरिकों, खासकर बंगाली हिंदुओं, छात्रों, बुद्धिजीवियों और ग्रामीण लोगों को निशाना बनाया गया। अनेक रिपोर्टों में दावा किया गया है कि हजारों लोगों की हत्या की गई, महिलाओं के साथ अत्याचार हुए और लाखों लोगों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर हुई हिंसा को केवल सैन्य कार्रवाई नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह एक सुनियोजित नरसंहार था। कई संगठनों ने संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से मांग की है कि 1971 की इन घटनाओं की आधिकारिक जांच कराई जाए और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए इसे जनसंहार के रूप में मान्यता दी जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे पर लंबे समय तक राजनीतिक कारणों से खुलकर चर्चा नहीं हो पाई, लेकिन अब नए दस्तावेज, शोध और गवाहियों के सामने आने के बाद इतिहास के इस अध्याय को फिर से समझने की कोशिश हो रही है। कुछ देशों के सांसदों और मानवाधिकार समूहों ने भी इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की बात कही है।
दूसरी ओर, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि इस विषय पर फैसला करना आसान नहीं है, क्योंकि उस समय की परिस्थितियां जटिल थीं और अलग-अलग पक्षों के अलग-अलग दावे हैं। फिर भी, पीड़ित परिवारों का कहना है कि सच्चाई को स्वीकार करना ही न्याय की दिशा में पहला कदम होगा।
1971 के युद्ध के दौरान लाखों शरणार्थी भारत आए थे, जिससे उस समय भारत पर भी भारी दबाव पड़ा था। बाद में इसी संघर्ष के परिणामस्वरूप बांग्लादेश का गठन हुआ। अब कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि इतिहास के इस दर्दनाक अध्याय को सही रूप में दर्ज करना जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
ऑपरेशन सर्चलाइट को जनसंहार घोषित करने की मांग के साथ एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम उठाएगा या यह बहस केवल इतिहास की किताबों तक ही सीमित रह जाएगी।






