ईरान और अमेरिका के बीच संभावित शांति वार्ता एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में आ गई है। लेकिन इस बातचीत का असर सिर्फ वॉशिंगटन और तेहरान तक सीमित नहीं है—खाड़ी क्षेत्र के देश भी इसे बेहद ध्यान से देख रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि खाड़ी देशों का ईरान के प्रति रुख़ एक जैसा नहीं है। कोई सख़्ती की नीति अपनाए हुए है, तो कोई संवाद और संतुलन की राह पर चल रहा है। यही मतभेद इस पूरी शांति प्रक्रिया को जटिल बना रहे हैं।
खाड़ी देशों में सऊदी अरब लंबे समय तक ईरान के प्रति सबसे सख़्त रुख़ रखने वाला देश माना जाता रहा है। क्षेत्रीय वर्चस्व, यमन और सीरिया जैसे संघर्षों में विरोधी पक्षों का समर्थन, और सुरक्षा चिंताओं ने दोनों देशों के रिश्तों को वर्षों तक तनावपूर्ण बनाए रखा। हालांकि हाल के समय में चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंधों में कुछ सुधार देखने को मिला है, फिर भी रियाद ईरान की क्षेत्रीय गतिविधियों और परमाणु कार्यक्रम को लेकर सतर्क बना हुआ है।
वहीं दूसरी ओर क़तर और ओमान जैसे देश अपेक्षाकृत नरम रुख़ अपनाते रहे हैं। ओमान ने अतीत में कई बार अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई है, जबकि क़तर भी संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता देता है। इन देशों का मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए टकराव की बजाय बातचीत ही बेहतर रास्ता है।
संयुक्त अरब अमीरात का रुख़ बीच का माना जा सकता है। एक तरफ वह अमेरिका का करीबी सहयोगी है और सुरक्षा मामलों में ईरान को लेकर सतर्क रहता है, वहीं दूसरी तरफ आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को बनाए रखने के लिए उसने तेहरान के साथ संपर्क भी बनाए रखा है। इसी तरह कुवैत और बहरीन भी अपने-अपने हितों के अनुसार संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं, हालांकि बहरीन आम तौर पर सऊदी अरब के क़रीब खड़ा दिखता है।
इन अलग-अलग रुख़ों का सीधा असर ईरान–अमेरिका शांति वार्ता पर पड़ सकता है। यदि खाड़ी देश एकजुट होकर किसी साझा रणनीति पर सहमत नहीं होते, तो अमेरिका के लिए क्षेत्रीय समर्थन जुटाना मुश्किल हो सकता है। वहीं ईरान भी इन मतभेदों का लाभ उठाकर अपनी कूटनीतिक स्थिति मज़बूत करने की कोशिश कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर शांति वार्ता सफल होती है, तो इससे खाड़ी क्षेत्र में तनाव कम हो सकता है, तेल बाज़ार में स्थिरता आ सकती है और निवेश का माहौल बेहतर हो सकता है। लेकिन अगर बातचीत विफल होती है, तो क्षेत्रीय ध्रुवीकरण और बढ़ सकता है, जिससे सुरक्षा जोखिम भी बढ़ेंगे।
कुल मिलाकर, ईरान पर खाड़ी देशों का अलग-अलग रुख़ इस शांति प्रक्रिया की दिशा और परिणाम दोनों को प्रभावित कर सकता है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या ये देश अपने मतभेद भुलाकर किसी साझा दृष्टिकोण पर पहुंच पाते हैं या नहीं।







