“ईश्वर की आराधना इस भांति करो कि
यदि आराधना तुम्हें अग्नि की ओर ले जाये
तो भी तेरी भक्ति में कोई अन्तर ना आये।
उपासना ऐसी और मात्र ऐसी ही होनी
चाहिये जो एक सच्चे ईश्वर की आराधना
के अनुरूप और शोभनीय हो। अगर तुम
भय के कारण उसकी आराधना करते हो,
तो यह उसके सानिध्य के पवित्र दरबार के
लिए अशोभनीय होगा और इसे उस प्रभु
की एकता के प्रति तुम्हारा समर्पित कार्य
नहीं माना जा सकता।”
— दिव्यात्मा बाब
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