मध्य प्रदेश/इन्दौर: चीनी के दाम बढ़ते ही देश में मातम जैसा माहौल बन गया है। आम आदमी परेशान है कि अब चाय में चीनी डाले या बच्चों की फीस जमा करे। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को आम आदमी की नजर से देखना भी एक तरह की नादानी है। असली फायदा तो कारोबारियों और सरकार ने मिलकर देश के उन लाखों डायबिटीज मरीजों को दिया है, जो वर्षों से डॉक्टरों की एक ही सलाह सुन-सुनकर ऊब चुके थे-“चीनी कम कर दीजिए।”
डॉक्टरों ने बरसों तक समझाया कि चीनी से दूरी बनाइए। मरीज मुस्कुराकर कहते थे, “डॉक्टर साहब, जिंदगी में मिठास भी तो जरूरी है।” डॉक्टर बेचारे अपनी किताबें बंद कर देते थे। उन्हें क्या पता था कि जिस काम के लिए वे वर्षों से परामर्श दे रहे हैं, वह काम बाजार कुछ ही दिनों में कर देगा। अब चीनी इतनी महँगी हो रही है कि चाय में दो चम्मच डालने से पहले आदमी बैंक बैलेंस देखने लगा है। पहले लोग चाय में चीनी स्वाद के लिए डालते थे, अब कीमत देखकर चम्मच अपने आप रुक जाता है। घर की गृहिणी कहती है-“अजी सुनिए, आज चाय फीकी है।” पति जवाब देता है-“फीकी नहीं, जानेमन स्वास्थ्यवर्धक है।”
सरकार भी शायद यही चाहती है कि देश स्वस्थ रहे। स्वास्थ्य सुधार की ऐसी योजनाएँ किताबों में कहाँ मिलती हैं! चीनी महँगी कर दो, मिठाई अपने आप कम हो जाएगी। मिठाई कम होगी तो वजन कम होगा। वजन कम होगा तो डॉक्टर के पास जाने की जरूरत कम होगी। डॉक्टर के पास जाना कम होगा तो स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव कम होगा। यानी चीनी महँगी करना वास्तव में एक “बहुआयामी स्वास्थ्य योजना” है।
कारोबारियों ने भी इस महान अभियान में अपना योगदान दिया है। वे कह रहे हैं-“हम तो बाजार की मजबूरी में दाम बढ़ा रहे हैं।” जनता पूछती है-“लेकिन मजबूरी हर बार हमारी ही क्यों होती है?” व्यापारी मुस्कुराकर कहते हैं-“क्योंकि ग्राहक आप हैं।”
अब स्थिति यह है कि शादी-ब्याह में मिठाई का डिब्बा देने से पहले लोग उसे ऐसे देखते हैं, जैसे कोई कीमती सामान खरीद रहे हों। रिश्तेदार पूछते हैं-“कितनी मिठाई भेजी?” जवाब आता है-“भाई, भाव देखे हैं? आधा किलो में ही रिश्तेदारी निभा दी।” हलवाई भी परेशान नहीं, बल्कि बेहद गंभीर दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने मिठाई की प्लेट छोटी कर दी है। रसगुल्ला वही है, लेकिन आकार देखकर लगता है जैसे बचपन की कंचे खेलने वाली कोई पुरानी याद हो। जलेबी की एक-दो लड़ी देखकर ग्राहक सोचता है कि यह मिठाई है या उसका ट्रेलर। उधर डायबिटीज के मरीजों में एक नई खुशी है। अब उन्हें जब कोई मिठाई खिलाने की जिद करेगा तो वे बड़ी शालीनता से कह सकेंगे-“नहीं भाई, डॉक्टर ने मना किया है।” सामने वाला भी चीनी के भाव याद करके तुरंत कहेगा-“हाँ-हाँ, बिल्कुल मत खाना। वैसे भी बहुत महँगी है।”
सबसे ज्यादा फायदा उन लोगों को हुआ है जो वर्षों से कहते थे कि “मीठा छोड़ना बहुत मुश्किल है।” अब मुश्किल नहीं रही। इस निराली स्वास्थ्य योजना ने वह काम कर दिया जो इच्छाशक्ति नहीं कर पाई।
कहते हैं कि महँगाई जनता के लिए अभिशाप होती है, लेकिन हमारे यहाँ हर अभिशाप में कोई न कोई लाभकारी नीति छिपी होती है। पेट्रोल महँगा हो तो पैदल चलिए, सब्जी महँगी हो तो कम खाइए, बिजली महँगी हो तो अँधेरे में प्रकृति का आनंद लीजिए और चीनी महँगी हो तो स्वास्थ्य का।
इसलिए देशवासियो, परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। चीनी के दाम बढ़े हैं तो इसे “राष्ट्रीय स्वास्थ्य अभियान” समझिए। चाय फीकी होगी, मिठाई कम होगी, जेब हल्की होगी-लेकिन सरकार और बाजार की नजर में आपका स्वास्थ्य उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ रहा होगा।
और अगर कोई पूछे कि “चीनी इतनी महँगी क्यों हुई?”
तो मुस्कुराकर कहिए-“भाई साहब, यह महँगाई नहीं, डायबिटीज के खिलाफ सरकारी-व्यापारी संयुक्त अभियान है। बस फर्क इतना है कि अभियान का खर्च हमेशा मरीज यानी जनता ही उठाती है!” इसे कहते हैं यह कष्ट बड़ा ही स्पष्ट है।
(लेखक स्वयं डायबिटीज के मरीज हैं।)
संजय एम तराणेकर









