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October 17, 2026 3:38 pm

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बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना सही नहीं: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के लिए बनेगा राष्ट्रीय डेटाबेस

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बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना उचित नहीं है। आज के डिजिटल दौर में इंटरनेट शिक्षा, जानकारी और संवाद का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। ऐसे में बच्चों को इससे पूरी तरह वंचित करने के बजाय उन्हें सुरक्षित तरीके से इंटरनेट इस्तेमाल करने का अवसर देना जरूरी है।

इसी के साथ बच्चों के यौन शोषण से जुड़े ऑनलाइन कंटेंट पर रोक लगाने और ऐसी सामग्री को हटाने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने इस तरह की आपत्तिजनक सामग्री की पहचान करने और उसे हटाने के उद्देश्य से डेटाबेस तैयार करने से संबंधित निर्देश दिए हैं। इस कदम का मकसद बच्चों को ऑनलाइन शोषण और नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री से सुरक्षित रखना है।

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के लिए इंटरनेट पर पूर्ण प्रतिबंध को उचित नहीं माना

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने का मतलब उन्हें इंटरनेट से पूरी तरह दूर करना नहीं है। अदालत के अनुसार, इंटरनेट बच्चों को शिक्षा, रचनात्मक अभिव्यक्ति और जरूरी जानकारी तक पहुंच प्रदान करता है। इसलिए सुरक्षा के उपाय ऐसे होने चाहिए, जो बच्चों को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री और उसके लिए जिम्मेदार लोगों पर केंद्रित हों, न कि बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने पर।

आपत्तिजनक सामग्री हटाने के लिए बनेगा राष्ट्रीय डेटाबेस

अदालत ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री की पहचान और उसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से हटाने के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने के निर्देश दिए हैं। इसमें ऐसी पुष्ट सामग्री के डिजिटल हैश पहचान-चिह्न और संबंधित URL शामिल किए जाएंगे, ताकि सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन सेवाएं उस सामग्री की पहचान कर उसे हटाने की कार्रवाई कर सकें।

अदालत ने यह भी कहा कि डेटाबेस में किसी सामग्री को शामिल करने से पहले उसकी उचित जांच जरूरी होगी। गलत पहचान के कारण वैध सामग्री न हटे, इसके लिए सत्यापन, निगरानी और शिकायत निवारण की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी।

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए सुझाए गए उपाय

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों की सुरक्षा के लिए अभिभावकों की निगरानी, उम्र के अनुरूप सुरक्षा व्यवस्था और विशेष ‘चाइल्ड मोड’ जैसे विकल्पों पर भी जोर दिया। बच्चों के अकाउंट को डिफॉल्ट रूप से निजी रखना, अनजान वयस्कों के संदेशों पर नियंत्रण और बच्चों तक पहुंचने वाले विज्ञापनों तथा कंटेंट की निगरानी जैसे उपायों पर विचार किया जा सकता है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इंटरनेट के अधिकार का अर्थ यह नहीं है कि बच्चों को हर तरह की सामग्री तक बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के पहुंच मिलनी चाहिए। उम्र के अनुरूप प्रतिबंध और हानिकारक सामग्री को रोकने के उपाय लागू किए जा सकते हैं।

केंद्र सरकार को आगे की कार्रवाई करनी होगी

यह मामला बच्चों को ऑनलाइन यौन शोषण से बचाने और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही सुनिश्चित करने से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस दिशा में उठाए गए कदमों की जानकारी देने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को निर्धारित की गई है।

इस फैसले का मुख्य संदेश है कि बच्चों को इंटरनेट के लाभों से वंचित किए बिना उनकी डिजिटल सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। इसके लिए सरकार, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, स्कूलों और अभिभावकों की भूमिका अहम होगी।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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