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August 30, 2026 2:07 pm

दारमा वैली में मंडरा रहा लैंडस्लाइड का खतरा! 58 फीसदी क्षेत्र संवेदनशील, वैज्ञानिकों की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

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उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले की सीमांत दारमा वैली में भूस्खलन का खतरा गंभीर रूप से बढ़ता दिखाई दे रहा है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के अध्ययन में सामने आया है कि घाटी का करीब 58 फीसदी हिस्सा भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील है। वैज्ञानिकों ने 1,364 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन किया है, जिसने पहाड़ी इलाकों में बढ़ते प्राकृतिक खतरे को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

10 साल में 295 भूस्खलन की घटनाएं

अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2015 से 2025 के बीच दारमा वैली में 295 भूस्खलन की घटनाएं दर्ज की गईं। वैज्ञानिकों को यहां कई ऐसे भूस्खलन क्षेत्र मिले हैं, जिनका विस्तार करीब 700 मीटर से लेकर एक किलोमीटर तक है। घाटी में करीब 4,000 मीटर की ऊंचाई तक आबादी भी बसी हुई है, जिससे प्राकृतिक आपदा का जोखिम और महत्वपूर्ण हो जाता है।

तीखे ढलान से बढ़ रहा खतरा

वैज्ञानिकों ने भूस्खलन के पीछे ढलान, ऊंचाई और जल निकासी समेत 15 प्रमुख कारणों की पहचान की है। दारमा वैली के कई हिस्सों में ढलान 45 से 55 डिग्री तक है। ऐसे तीखे ढलान बारिश और अन्य प्राकृतिक परिस्थितियों में जमीन के खिसकने की आशंका बढ़ा सकते हैं।

अध्ययन में पहाड़ों में तापमान के उतार-चढ़ाव को भी एक महत्वपूर्ण कारक बताया गया है। दिन में चट्टानों का गर्म होना और रात में अत्यधिक ठंड के कारण सिकुड़ना-पसारना पहाड़ों में दरारें पैदा कर सकता है। समय के साथ ये दरारें ढलानों को कमजोर कर सकती हैं।

बारिश के बदलते पैटर्न ने बढ़ाई चिंता

वैज्ञानिकों के अनुसार, क्षेत्र में बारिश का पैटर्न भी बदल रहा है। पहले लगातार तीन-चार दिनों तक बारिश न होने की स्थिति अधिक आम थी, जबकि अब बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ रही है। ज्यादा पानी जमीन के भीतर जाने से पोर वॉटर प्रेशर बढ़ सकता है, जिससे मिट्टी और ढलान कमजोर होने की संभावना रहती है।

इसके अलावा छोटे भूकंपीय झटके भी कमजोर ढलानों पर ट्रिगर का काम कर सकते हैं। यानी भारी बारिश और भूकंपीय गतिविधि का संयुक्त प्रभाव कुछ क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा बढ़ा सकता है।

वैज्ञानिकों ने तैयार किया रिस्क मैप

वाडिया संस्थान के वैज्ञानिकों ने मशीन लर्निंग मॉडल और सैटेलाइट डेटा की मदद से दारमा वैली के लिए भूस्खलन जोखिम का आकलन किया है। अध्ययन में बारिश और बड़े भूकंप के संयुक्त प्रभाव को ध्यान में रखते हुए भी जोखिम का विश्लेषण किया गया। 

रिपोर्ट के मुताबिक, दारमा घाटी का करीब 9 फीसदी क्षेत्र हाई से वेरी-हाई रिस्क जोन में आता है, जबकि करीब 22 फीसदी क्षेत्र मध्यम जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। यह मैप भविष्य में संवेदनशील इलाकों की पहचान और आपदा प्रबंधन की योजना बनाने में उपयोगी हो सकता है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिहाज से भी अहम

दारमा वैली भौगोलिक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यह कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़े मार्गों के लिहाज से भी अहम है। ऐसे में यहां भूस्खलन की संवेदनशीलता केवल स्थानीय आबादी के लिए ही नहीं, बल्कि आवाजाही और संपर्क व्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय बन सकती है।

अब निगरानी और सतर्कता जरूरी

अध्ययन ने पहाड़ी क्षेत्रों में आपदा जोखिम को समझने के लिए वैज्ञानिक निगरानी की जरूरत को रेखांकित किया है। खासकर मानसून के दौरान बारिश, ढलानों में बदलाव और नए भूस्खलन क्षेत्रों पर लगातार नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।

दारमा वैली की यह रिपोर्ट एक बड़ी चेतावनी के तौर पर सामने आई है कि हिमालयी क्षेत्रों में बदलता मौसम, तीखे ढलान, भूगर्भीय गतिविधियां और बारिश मिलकर भूस्खलन का जोखिम बढ़ा सकते हैं। वैज्ञानिक अध्ययन से तैयार जोखिम मानचित्र प्रशासन को संवेदनशील इलाकों में बेहतर आपदा-प्रबंधन और पूर्व तैयारी की योजना बनाने में मदद कर सकता है।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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