सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी की प्रभावशीलता पर टिप्पणी करते हुए इससे जुड़ी पांच प्रमुख समस्याओं का जिक्र किया है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने महाराष्ट्र पॉइजन्स रूल्स के नियम 18A और 18B को रद्द करने के मामले की सुनवाई के दौरान शराबबंदी की नीति के व्यापक प्रभावों पर चर्चा की।
अदालत ने शराबबंदी से जुड़े जिन पांच पहलुओं को रेखांकित किया, उनमें सरकारी राजस्व का नुकसान, प्रतिबंध लागू करने में होने वाला खर्च, पुलिस और आबकारी तंत्र में भ्रष्टाचार, अवैध शराब बनाने का कारोबार और उससे जुड़ी नशीले पदार्थों की समस्या शामिल हैं।
अवैध शराब के कारोबार पर भी चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूर्ण शराबबंदी के कारण शराब का कारोबार भूमिगत हो सकता है और इससे बिना नियमन वाली शराब के प्रसार का खतरा बढ़ सकता है। अदालत ने गुजरात समेत अन्य राज्यों में जहरीली शराब से हुई घटनाओं का भी उल्लेख किया।
अदालत के अनुसार, गुजरात में लंबे समय से शराबबंदी लागू होने के बावजूद कई बड़ी जहरीली शराब त्रासदियां हुई हैं। कोर्ट ने राज्य में ऐसी कम से कम 10 बड़ी घटनाओं का जिक्र किया, जिनमें 600 से अधिक लोगों की मौत का उल्लेख किया गया।
महाराष्ट्र के मेथनॉल नियमों का मामला
यह टिप्पणी महाराष्ट्र में मेथनॉल की खरीद और बिक्री से जुड़े नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुनाते समय आई। संबंधित नियमों में गैर-दवा निर्माताओं को मेथनॉल बेचने से पहले उसमें रंग और कड़वा पदार्थ मिलाने की शर्त थी। ये नियम 1991 में मुंबई में मेथनॉल वाली जहरीली शराब से 93 लोगों की मौत के बाद बनाए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों को रद्द करते हुए कहा कि राज्य यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि ऐसे पदार्थ मिलाने से जहरीली शराब से होने वाली मौतों को निश्चित रूप से कैसे रोका जा सकेगा। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि दूसरे मिलावटी पदार्थों का इस्तेमाल कर नकली शराब बनाने की स्थिति में रोकथाम कैसे होगी।
इस टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने शराबबंदी के उद्देश्य और उसके जमीनी असर के बीच संबंध पर गंभीर सवाल उठाए हैं। हालांकि, अदालत की टिप्पणी को किसी राज्य की शराब नीति को सीधे खत्म करने के आदेश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए; मामला मुख्य रूप से महाराष्ट्र के विशेष नियमों से जुड़ा था।








