हरिद्वार। योग गुरु स्वामी रामदेव ने सनातन धर्म को जानबूझकर बदनाम करने और इसके खिलाफ साजिश रचने का गंभीर आरोप लगाया है। हरिद्वार में आयोजित एक पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए उन्होंने दावा किया कि मुगलकाल और ब्रिटिश शासन के दौरान हिंदू धर्मग्रंथों की गलत व्याख्याएं फैलाई गईं और उनमें मिलावट की गई, ताकि भारतीय समाज में स्थायी रूप से विभाजन और वैमनस्य पैदा किया जा सके।
स्वामी रामदेव ने स्पष्ट किया कि सनातन धर्म पूरी तरह से समानता, सामाजिक सद्भाव, सार्वभौमिकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है तथा इसमें किसी भी प्रकार के भेदभाव या अपमान का कोई स्थान नहीं है।
धार्मिक ग्रंथों और सांस्कृतिक परंपराओं पर चल रही समकालीन बहसों का उल्लेख करते हुए स्वामी रामदेव ने मनुस्मृति और वाल्मीकि रामायण जैसे प्राचीन ग्रंथों के कुछ श्लोकों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि इन ग्रंथों में कई संदर्भ जानबूझकर बाद में जोड़े गए या उनकी गलत व्याख्या की गई, ताकि सनातन धर्म और इसकी पवित्र परंपराओं को नकारात्मक रूप से प्रस्तुत किया जा सके।
उन्होंने आरोप लगाया कि वाल्मीकि रामायण में ऐसे भ्रामक प्रसंग शामिल किए गए जो यह दर्शाते हैं कि भगवान राम और माता सीता ने मांसाहार या मदिरा का सेवन किया, या भगवान राम ने शूद्रों और महिलाओं का अनादर किया। उन्होंने इन मिलावटों को एक बड़ा धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक अपराध करार दिया और कहा कि राजनीतिक हस्तियों ने ऐसे दुष्कृत्य करने वालों को संरक्षण प्रदान किया।
सामाजिक संरचना पर बात करते हुए योग गुरु ने कहा कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का विभाजन व्यक्ति के जन्म पर नहीं बल्कि उसके कर्म पर आधारित था, लेकिन समय के साथ इसे गलत तरीके से पेश करके समाज को बांटने का काम किया गया। उन्होंने कहा कि संकीर्ण धार्मिक और राजनीतिक स्वार्थों के कारण लगभग 30 से 40 करोड़ लोगों को सनातन धर्म से दूर करने का प्रयास किया गया। स्वामी रामदेव ने वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत का स्मरण कराते हुए कहा कि सनातन धर्म पूरी पृथ्वी को एक परिवार मानता है और यह सीमाओं से परे जाकर समूची मानवता के कल्याण की बात करता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि विश्व भर में 150 करोड़ से अधिक लोग सनातन परंपराओं से जुड़े हैं और भारत के बहुसंख्यक मुस्लिम समाज के पूर्वज भी यही के प्राचीन ऋषि-मुनि रहे हैं।
योग और आयुर्वेद के बढ़ते वैश्विक प्रभाव का उदाहरण देते हुए स्वामी रामदेव ने कहा कि सनातन धर्म के सिद्धांत पूरी तरह से प्रामाणिक और वैज्ञानिक कसौटी पर खरे उतरते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ शक्तियां छल, कपट और भ्रम फैलाकर सनातन धर्म को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल संस्कृत में लिखा होने मात्र से कोई रचना धर्मग्रंथ नहीं बन जाती, बल्कि उसके विचार और सिद्धांत सार्वभौमिक, सर्वहितकारी तथा शाश्वत होने चाहिए।








