राजस्थान में साइबर ठगी के एक बड़े मामले में पुलिस ने महत्वपूर्ण कार्रवाई करते हुए रिटायर्ड ADG से 2.12 करोड़ रुपये की डिजिटल ठगी करने के आरोप में एक जिम ट्रेनर को महाराष्ट्र से गिरफ्तार किया है। इस मामले में पुलिस अब तक कुल 7 आरोपियों को पकड़ चुकी है। पुलिस की जांच में ठगी के नेटवर्क और इसमें शामिल अन्य लोगों की भूमिका का पता लगाने की कोशिश की जा रही है। यह मामला साइबर अपराधियों द्वारा लोगों को डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डराकर बड़ी रकम ऐंठने के तरीके को उजागर करता है।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 2.12 करोड़ रुपये की ठगी
डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध का ऐसा तरीका है, जिसमें ठग खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या किसी अन्य जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। वे पीड़ित को किसी कथित आपराधिक मामले में फंसाने की धमकी देते हैं और गिरफ्तारी का भय दिखाकर उसे अपने निर्देशों का पालन करने के लिए मजबूर करते हैं। कई मामलों में ठग पीड़ित को वीडियो कॉल पर लगातार जुड़े रहने और किसी से संपर्क नहीं करने के लिए कहते हैं। इसके बाद जांच या कानूनी कार्रवाई से बचाने के नाम पर बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करवाए जाते हैं।
राजस्थान के इस मामले में भी रिटायर्ड ADG को निशाना बनाकर 2.12 करोड़ रुपये की ठगी किए जाने का आरोप है। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने जांच का दायरा बढ़ाया और कथित ठगी में शामिल लोगों तक पहुंचने के लिए कार्रवाई की।
महाराष्ट्र से पकड़ा गया जिम ट्रेनर
पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए एक जिम ट्रेनर को महाराष्ट्र से गिरफ्तार किया है। पुलिस अब गिरफ्तार आरोपी से पूछताछ कर यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि ठगी की रकम किस तरह इधर-उधर की गई और इस पूरे नेटवर्क में उसकी क्या भूमिका थी। साथ ही, यह भी जांच की जा रही है कि आरोपी का संपर्क अन्य संदिग्धों से किस प्रकार था और ठगी से प्राप्त रकम का इस्तेमाल कहां किया गया।
इस गिरफ्तारी के साथ ही मामले में पकड़े गए आरोपियों की संख्या बढ़कर सात हो गई है। पुलिस को उम्मीद है कि पूछताछ और वित्तीय लेन-देन की जांच से साइबर ठगी से जुड़े अन्य लोगों के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।
साइबर ठगी के नेटवर्क की जांच में जुटी पुलिस
डिजिटल अरेस्ट के मामलों में अक्सर ठग अलग-अलग लोगों को अलग-अलग जिम्मेदारियां देते हैं। कोई व्यक्ति पीड़ित से संपर्क कर उसे डराने का काम करता है, तो कोई बैंक खातों या अन्य माध्यमों से रकम प्राप्त करने और उसे आगे भेजने में शामिल हो सकता है। हालांकि, इस मामले में गिरफ्तार जिम ट्रेनर की वास्तविक भूमिका और अन्य आरोपियों के साथ उसके संबंधों की पुष्टि पुलिस की जांच के आधार पर ही होगी।
जांच एजेंसियां ऐसे मामलों में बैंक खातों, संदिग्ध लेन-देन, मोबाइल फोन और डिजिटल साक्ष्यों की मदद से पूरे घटनाक्रम को समझने का प्रयास करती हैं। पुलिस यह भी पता लगा सकती है कि ठगी की रकम किन खातों में पहुंची और क्या इस मामले के तार दूसरे राज्यों में सक्रिय साइबर अपराधियों से जुड़े हैं।
डिजिटल अरेस्ट से बचने के लिए रहें सतर्क
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली ठगी से बचने के लिए लोगों को कुछ जरूरी सावधानियां बरतनी चाहिए। पुलिस या कोई भी जांच एजेंसी वीडियो कॉल के जरिए किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से गिरफ्तार नहीं करती और न ही गिरफ्तारी से बचाने के नाम पर पैसे
ट्रांसफर करने की मांग करती है।
अगर कोई व्यक्ति खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर गिरफ्तारी की धमकी देता है और पैसे जमा कराने के लिए दबाव बनाता है, तो घबराने के बजाय उसकी बातों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करनी चाहिए। किसी भी अनजान व्यक्ति को बैंक खाते की जानकारी, ओटीपी या अन्य गोपनीय विवरण नहीं देने चाहिए।
साइबर ठगी का शिकार होने पर तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर संपर्क करें या आधिकारिक वेबसाइट cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज कराएं।
राजस्थान पुलिस की इस कार्रवाई के बाद अब मामले में आगे की जांच महत्वपूर्ण होगी। सात आरोपियों की गिरफ्तारी के बावजूद पुलिस के सामने ठगी की पूरी रकम का पता लगाने, कथित नेटवर्क के अन्य सदस्यों की पहचान करने और सभी आरोपियों की भूमिका स्पष्ट करने जैसी चुनौतियां हैं। जांच पूरी होने के बाद ही इस मामले से जुड़े सभी तथ्यों और ठगी के पूरे तरीके की विस्तृत जानकारी सामने आ सकेगी।








