नई दिल्ली। अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनावों में हार का सामना करने के बावजूद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति में किसी भी तरह के बड़े बदलाव की संभावना बेहद कम है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ही दल आर्थिक राष्ट्रवाद और सुरक्षात्मक टैरिफ का खुलकर समर्थन करते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आने वाले समय में टैरिफ का उपयोग एक सामान्य प्रवृत्ति बनी रहेगी। रिपोर्ट में बताया गया है कि ट्रंप कांग्रेस की औपचारिक मंजूरी के बिना भी अपनी कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल करके व्यापारिक मोर्चे पर दबाव बनाए रख सकते हैं। इसके अलावा, रूस, चीन और ईरान के मामलों में विदेशी नीति की चुनौतियों से जूझ रहे ट्रंप अमेरिकी प्रभाव को दुनिया भर में स्थापित करने के लिए भारत पर भी व्यापार समझौते को लेकर दबाव और तेज कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि चूंकि अमेरिकी राजनीति में दोनों प्रमुख दल स्थानीय श्रमिकों के हितों की रक्षा के नाम पर उच्च शुल्कों के पक्ष में हैं, इसलिए समग्र व्यापार रुख में नरमी आने की कोई उम्मीद नहीं है। राष्ट्रपति ट्रंप धारा 232 और 301 जैसी अपनी मौजूदा कार्यकारी शक्तियों के माध्यम से फैसले लेना जारी रखेंगे। भारत के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते के संदर्भ में रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि दोनों पक्षों के बीच महीनों से समझौते के करीब होने की बात कही जा रही है, परंतु अमेरिकी प्रस्तावों की अस्पष्टता के कारण इसमें लगातार विलंब हुआ है। अब यह आशंका जताई जा रही है कि ट्रंप अपनी शक्तियों का प्रयोग कर भारत को अमेरिकी कृषि व औद्योगिक उत्पादों के लिए अपना बाजार पूरी तरह खोलने और अन्य बड़ी रियायतें देने के लिए विवश कर सकते हैं।
यह प्रस्तावित समझौता भारत द्वारा किए गए अन्य पारंपरिक मुक्त व्यापार समझौतों से काफी अलग प्रकृति का है। सामान्यतः व्यापार समझौतों में दोनों देश अपने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) आयात शुल्कों में कटौती करते हैं, लेकिन इस प्रस्तावित अमेरिकी ढांचे के तहत वाशिंगटन अपने एमएफएन टैरिफ को बरकरार रखेगा जबकि भारत को अपने अधिकांश औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर शुल्क या तो पूरी तरह समाप्त करने होंगे या कम करने होंगे। जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, यह समझौता मुख्य रूप से रूसी कच्चे तेल की खरीद को लेकर अमेरिका द्वारा लगातार दी जा रही टैरिफ की धमकियों से प्रेरित प्रतीत होता है, जो पूरी तरह से एकतरफा दबाव का परिणाम है।
पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा ने ‘ईटीवी भारत’ के साथ बातचीत में बताया कि डोनाल्ड ट्रंप के स्वभाव और कार्यशैली को दशकों से देखने वाले यह अच्छी तरह जानते हैं कि वे अपने फैसलों को लेकर बेहद अडिग रहते हैं। पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के एक संस्मरण का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि ट्रंप दशकों से टैरिफ नीति के कट्टर समर्थक रहे हैं और बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों का उनके रुख पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ने वाला है। चाहे वह वीजा संबंधी सख्त नियम हों, नागरिकों की वापसी (डिपोर्टेशन) का मुद्दा हो या अन्य कूटनीतिक मामले, ट्रंप की नीतियों में फिलहाल किसी भी प्रकार की नरमी के आसार नहीं हैं। हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि अमेरिकी कांग्रेस में विपक्ष के मजबूत होने से ट्रंप के कुछ एकतरफा फैसलों की गति जरूर थोड़ी सीमित हो सकती है, जिससे वैश्विक स्तर पर खासकर ईरान और व्यापारिक साझेदारों के साथ उनके अगले कदमों पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।








