जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन और सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। 3 नवंबर को सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि किसी एक समूह को अनिश्चितकाल तक किसी विरोध स्थल पर कब्जा करके रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि हर नागरिक और संगठन को अपनी मांगों के समर्थन में प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन किसी एक समूह के लंबे समय तक वहां बने रहने से दूसरे लोगों का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए।
‘हर किसी को विरोध करने का अधिकार, लेकिन जगह पर स्थायी कब्जा नहीं’
CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों का इस्तेमाल अलग-अलग समूहों को तय समय के लिए मिलना चाहिए। किसी संगठन को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह एक बार किसी जगह पर पहुंच जाए तो वहां से दूसरे प्रदर्शनकारियों को आने ही न दे।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सवाल उठाया कि यदि एक समूह लगातार किसी विरोध स्थल पर बना रहता है, तो दूसरे लोग कहां प्रदर्शन करेंगे? अदालत ने किसानों, मजदूरों, ट्रेड यूनियनों और बेघर लोगों का उदाहरण देते हुए कहा कि सभी को अपनी बात रखने का अधिकार है। इसलिए विरोध स्थलों का इस्तेमाल संतुलित और व्यवस्थित तरीके से होना चाहिए।
रोज कमाने वाले लोगों की आजीविका पर भी जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन के अधिकार के साथ-साथ आम नागरिकों की आजीविका का मुद्दा भी उठाया। CJI ने कहा कि विरोध प्रदर्शन के कारण रोजाना कमाने वाले मजदूरों और छोटे कारोबारियों को नुकसान नहीं होना चाहिए। अदालत के मुताबिक, एक तरफ संविधान विरोध करने का अधिकार देता है, वहीं दूसरी तरफ लोगों को व्यापार और रोजगार करने का अधिकार भी प्राप्त है।
पीठ ने कहा कि इन दोनों अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। किसी प्रदर्शन के कारण यदि किसी व्यक्ति की रोजी-रोटी प्रभावित होती है, तो उसकी चिंता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
CJP के प्रदर्शन का भी सुनवाई में आया जिक्र
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कॉकroach जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन का उल्लेख किया। उन्होंने अदालत को बताया कि जुलाई में पार्टी को जंतर-मंतर पर एक दिन के प्रदर्शन की अनुमति दी गई थी, लेकिन प्रदर्शनकारी कथित तौर पर 17 दिनों तक वहां बने रहे। उन्होंने यह भी कहा कि इसके बाद बिना अनुमति संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की गई थी।
इस पर अदालत ने विरोध स्थल के इस्तेमाल और अनुमति की शर्तों को लेकर सवाल उठाए। मामले में CJP से जुड़े प्रदर्शन और उससे पैदा हुई परिस्थितियों का संदर्भ भी चर्चा में आया।
जंतर-मंतर के अलावा रामलीला मैदान का भी उठा मुद्दा
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने रामलीला मैदान का जिक्र करते हुए कहा कि यह प्रदर्शन के लिए अधिसूचित स्थान है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि जंतर-मंतर और रामलीला मैदान जैसे स्थानों पर भी प्रदर्शन को लेकर मुश्किलें होंगी, तो लोग अपनी बात रखने कहां जाएंगे?
अदालत के सामने यह मुद्दा भी आया कि प्रदर्शनकारियों को उचित सुविधाएं उपलब्ध कराने और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए वैकल्पिक स्थानों पर विचार किया जाना चाहिए।
प्रदर्शन के दौरान निगरानी और निजता पर भी चर्चा
सुनवाई में प्रदर्शन के दौरान CCTV निगरानी और निजता के अधिकार का मुद्दा भी उठा। अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सवाल किया कि सार्वजनिक स्थान पर प्रदर्शन कर रहे लोगों की निगरानी किस कानूनी आधार पर की जा रही है।
इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वहां CCTV कैमरों के जरिए निगरानी की जा रही थी। CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि सार्वजनिक स्थान पर मौजूद व्यक्ति की निजता की उचित अपेक्षा की सीमा अलग हो सकती है। हालांकि, अदालत के सामने निगरानी के कानूनी आधार से जुड़ा सवाल भी रखा गया।
क्या है पूरे मामले का बड़ा संदेश?
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का मुख्य संदेश यह है कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन सार्वजनिक स्थानों का इस्तेमाल किसी एक समूह के स्थायी कब्जे के लिए नहीं किया जा सकता। प्रदर्शनकारियों, स्थानीय कारोबारियों, मजदूरों और आम नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी है।
अदालत की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति, स्थल की स्थिति और CJP से जुड़े आंदोलन को लेकर विवाद चल रहा है। फिलहाल सुनवाई में अदालत ने विरोध के अधिकार को खारिज नहीं किया, बल्कि इस अधिकार के साथ सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरे नागरिकों के हितों का संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया है।








