नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दो अलग-अलग याचिकाओं पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है, जिनमें केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी उन आदेशों को चुनौती दी गई है जिनके तहत औपचारिक सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के सभी छह पदों (छंदों) का गायन अनिवार्य कर दिया गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय को नोटिस जारी कर दिया है।
यह मामला गृह मंत्रालय द्वारा जनवरी और जुलाई 2026 में जारी किए गए दो अलग-अलग सरकारी आदेशों (GO) से जुड़ा हुआ है। नागपुर के एक बौद्ध कार्यकर्ता बीडी बोरकर और पूर्व आईएएस अधिकारी बालकृष्णन सत्यभामा मावोजी द्वारा दायर याचिकाओं में इन आदेशों को असंवैधानिक और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ बताया गया है। याचिकाओं में तर्क दिया गया है कि 1870 के दशक में बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखे गए वंदे मातरम के शुरुआती दो पद किसी धार्मिक देवता का संदर्भ नहीं देते और केवल प्रकृति की वंदना करते हैं, जिसे पिछले 79 सालों से राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है। जबकि बंकिम चंद्र के उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल तीसरे से छठे पद में कुछ विशेष धार्मिक पहलुओं का समावेश है, जिन्हें थोपना नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
पूर्व प्रशासनिक अधिकारी मावोजी ने अपनी याचिका में उल्लेख किया कि भारत के संविधान में निहित बंधुत्व, धर्मनिरपेक्षता और विचार एवं धर्म की स्वतंत्रता के तहत वंदे मातरम के सभी छह पदों को अनिवार्य बनाना अनुचित है। उन्होंने मांग की है कि गृह मंत्रालय के दोनों आदेशों को रद्द किया जाए और दो पदों वाले वंदे मातरम को ही आधिकारिक मान्यता दी जाए। उल्लेखनीय है कि कर्नाटक संगीतकार टीएम कृष्णा द्वारा भी इस संबंध में ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम’ में संशोधन को चुनौती देने वाली याचिका दायर की जा चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को सूचीबद्ध करते हुए मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर तय की है।








